वेदप्रिय शास्त्री

गर्व योग्य नाम (भाग १)

संसार में नाम का बड़ा महत्व है। भगवान ने सृष्टि रचकर सभी पदार्थों को नाम दिये हैं, जो उनके गुण धर्मों के अनुसार सार्थक और व्यहार्य हैं। वैदिकों में तो नामकरण एक संस्कार के रूप में ही स्वीकार किया गया है। जिसमें नए उत्पन्न प्रत्येक बालक को सुन्दर सार्थक नाम देने का विधान है। नाम …

गर्व योग्य नाम (भाग १) Read More »

गर्व योग्य नाम (भाग २)

हिन्दू शब्द पर स्वामी विवेकानन्द के विचार –     हिन्दू नाम त्यागने का परामर्श केवल स्वामी दयानन्द ने ही नहीं दिया, स्वामी विवेकानन्द को भी इस पर आपत्ति थी | उन्होंने अपने एक व्याख्यान में इस प्रकार कहा  –   “ जिस हिन्दू नाम से परिचित होना आज कल हम लोगों में प्रचलित है, इस …

गर्व योग्य नाम (भाग २) Read More »

ब्राह्मण वेद नहीं

– वेदप्रिय शास्त्री महर्षि दयानंद मन्त्रसंहिताओं को ही वेद स्वीकार करते हैं। ब्राह्मण भाग की वेद संज्ञा स्वीकार नहीं करते। उनसे पूर्व और उनके समय के कतिपय विद्वान् मंत्र संहिताओं के साथ ब्राह्मण भाग को भी वेद नाम देने का आग्रह करते थे। इसके लिए वे प्रमाण रूप में एक सूत्र उपस्थित करते थे जिसे …

ब्राह्मण वेद नहीं Read More »

vedpriya shastri

वेद विवेचना

वेद विवेचना – वेदप्रिय शास्त्री वैदिक वाङ्मय में ‘वेद’ शब्द दो प्रकार का मिलता है। एक आद्युदात्त और दूसरा अंतोदात्त। इनमे से प्रथम जो आद्युदात्त है, वह ज्ञान का पर्याय है! यह ‘विद् ज्ञाने’ धातु से निष्पादित है। आचार्य पाणिनी ने इसे वृषादि गण मे पढ़ा है। दूसरा वेद शब्द, जो अंतोदात्त है, वह दर्भमुष्टि …

वेद विवेचना Read More »

साथी कहो! कहाँ से लाऊँ ?

सोए युग की आँख खोलकर, मादकता में जहर घोल दे । दानवीय कारा में बन्दी, मानवता के पाश खोल दे ।। ऐसा गीत कहाँ से लाऊँ ।१।? साथी कहो! कहाँ से लाऊँ ? जो गिरते को सम्हाल लेवे, गिरे हुए को पुनः उठा ले । मुरझाए को विकसित कर दे, ठुकराए को गले लगा ले …

साथी कहो! कहाँ से लाऊँ ? Read More »

उस रोगी को कौन बचाए, दवा समझता जो विष को

दुराचार उपदेश बने, व्यभिचार मुक्ति का द्वार हुआ। कविता बनी चरित्र हीनता, योगी सब संसार हुआ। जीव अधिकतर ब्रह्म हुए कामी कुत्ते भगवान बने। अश्लीलता संस्कृति बन गई और धूर्त विद्वान् बने। घोर अविद्या के पुतले शंकराचार्य कहलाते हैं। राग- द्वेष से पूर्ण, स्वयं को वीतराग बतलाते हैं। यम और नियम उदास खड़े हैं, योगासन …

उस रोगी को कौन बचाए, दवा समझता जो विष को Read More »

योगेश्वर श्रीकृष्ण (भाग ४)

श्रीकृष्ण के कार्य का परिणाम – कृष्ण जी के नेतृत्व में लड़े गए महाभारत को देखने से ऐसा नहीं लगता कि कृष्ण ने कोई भला कार्य किया है । परिवारी जनों को परस्पर लड़ा कर संपूर्ण वंश का सर्वनाश करवा देना यह कौन सी बुद्धिमता है ? प्राय: लोगों के द्वारा ऐसे प्रश्न किए जाते …

योगेश्वर श्रीकृष्ण (भाग ४) Read More »

योगेश्वर श्रीकृष्ण (भाग १)

श्रीकृष्ण नाम सुनते ही हमारी आंखों के सामने दो तरह के चरित्र उपस्थित हो जाते हैं। एक है ‘चौर जार शिखामणि’ अर्थात चोरों और व्यभिचारयों का शिरोमणि, बांसुरी बजाने वाला, रासलीला करने वाला, परनारियों का अभिमर्षक, धूर्त और लंपट चरित्र जिससे किसी भी प्रकार से आदर्श नहीं बनाया जा सकता, भले ही वह परमात्मा का …

योगेश्वर श्रीकृष्ण (भाग १) Read More »

Show Buttons
Hide Buttons