आर्य लेखक परिषद् देश के सभी राष्ट्रभक्त लेखको का आव्हान करती है ।

आर्य लेखक परिषद् – एक परिचय

आर्य लेखक परिषद् यह आर्य लेखकों की पंजीकृत संस्था है । इसका कार्यक्षेत्र संपूर्ण भारत देश और वे सभी देश जहाँ-जहाँ आर्य समाज व आर्य लेखक विद्यमान है, हैं ।

स्थापना –

इसकी स्थापना दिनांक- 30-11-91 में आयोजित एक  त्रिदिवसीय आर्य लेखक सम्मेलन में  की गई थी । यह सम्मेलन इंस्ट्रूमेंटेशन लिमिटिड कोटा के हॉल में आयोजित किया गया था।  कोटा राजस्थान प्रांत का प्रसिद्ध नगर और जिला है ।

इस सम्मेलन के संयोजक श्री वेदप्रिय शास्त्री सीताबाड़ी जिला कोटा राजस्थान थे और अध्यक्ष जोधपुर निवासी प्रसिद्ध लेखक डॉक्टर भवानी लाल जी भारतीय थे । यह सम्मेलन डॉक्टर रामकृष्ण आर्य द्वारा लिखित शोध ग्रंथ ‘महर्षि दयानंद का आर्थिक चिंतन’ के प्रकाशित संस्करण के विमोचन के अवसर पर आयोजित किया गया था । डॉ. रामकृष्ण आर्य को इसी ग्रंथ पर पंजाब विश्वविद्यालय स्थित ‘दयानंद पीठ’ की ओर से पीएचडी की उपाधि प्राप्त हुई थी । इस प्रसिद्ध ग्रंथ का विमोचन प्रसिद्ध पत्रकार डॉ. वेदप्रताप जी वैदिक के कर कमलों द्वारा किया गया था । इसी अवसर पर सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया था कि ‘आर्य लेखक परिषद्’ की गठन करके उसे पंजीकृत करा लिया जावे ।

उद्देश्य –

उक्त सम्मेलन के संयोजक के वक्तव्य से परिषद के उद्देश्य का पता चलता है । संयोजक श्री वेदप्रिय शास्त्री ने कहा था

‘मित्रों ! हम सब एक महाव्रत में दीक्षित हैं और हमें मिलकर एक महान लक्ष्य को पूरा करना है । वह लक्ष्य है संसार को आर्य बनाकर एक विश्व आर्य समाज का निर्माण करना, वैदिक वर्णाश्रम व्यवस्था और चक्रवर्ती आर्य साम्राज्य की स्थापना करना ।

यह एक सामूहिक कार्य है, जिसकी सिद्धि हम सबके सम्मिलित प्रयास से ही संभव है । एतदर्थ हमारे सम्मिलित संकल्प और सम्मिलित योजना की आवश्यकता है, जिसका आज अभाव है । परिणाम स्वरुप हमारा रचनात्मक विकास व प्रगति अवरुद्ध हो गए हैं । हमारी शक्ति क्षीण हो रही है और हमारा अस्तित्व ही संकट ग्रस्त हो रहा है । दीनता, किंकर्तव्यविमूढ़ता की काली छाया और निराशा के  मेघ मंडरा रहे हैं । पाखंड के कोलाहल में हमारी ध्वनि लुप्त प्राय हो गई है । आपको विदित है कि भाषण प्रवचन की अपेक्षा लेखन एक अत्यंत सशक्त माध्यम है । क्रांति की प्रेरणा उत्पन्न करने की अजेय शक्ति आप सब में समाहित है । आवश्यकता है सुनियोजित सम्मिलित सृजन की और सामूहिक प्रहार की, सामूहिक आर्य चेतना के एक अंगभूत की।

मैंने जीवन की आशा से प्रयत्न रूप में यही करना उचित समझा कि आप सब को एकत्र कर दूँ ; जिससे कि सब मिलकर जीवन और प्रगति का कोई उपाय खोज सकें । आपका स्थान शरीर में मन की तरह है, देखना यह है कि कहीं आप हारे तो नहीं, धैर्य तो नहीं छोड़ दिया । यदि आप सशक्त और सचेष्ट हैं तो जर्जर काया को सशक्त और सचेष्ट करना कठिन न होगा । यही उद्देश्य है आपको यहां बुलाने का । अब क्या करना है ? यह आप सबको मिलकर सोचना है, मिलकर करना है, यदि कर सके तो । ‘

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