vedpriya shastri

वेद विवेचना

वेद विवेचना

– वेदप्रिय शास्त्री

वैदिक वाङ्मय में ‘वेद’ शब्द दो प्रकार का मिलता है। एक आद्युदात्त और दूसरा अंतोदात्त। इनमे से प्रथम जो आद्युदात्त है, वह ज्ञान का पर्याय है! यह ‘विद् ज्ञाने’ धातु से निष्पादित है। आचार्य पाणिनी ने इसे वृषादि गण मे पढ़ा है। दूसरा वेद शब्द, जो अंतोदात्त है, वह दर्भमुष्टि से निर्मित एक यज्ञीय उपकरण का पारिभाषिक नाम है।

आद्युदात्त ‘वेद’ शब्द ऋक्, यजु, साम और अथर्व संज्ञक मंत्र संहिताओं के साथ संयुक्त होकर मंत्र संहिता मात्र के लिए लोक में विख्यात है। केवल ‘वेद’ कहने मात्र से इन्हीं का बोध होता है। तात्पर्य यह है कि मंत्र संहिताओं की ही वेद संज्ञा है।

कालांतर मे यही वेद शब्द अनेक ज्ञान के आधारभूत ग्रन्थों के साथ जुड़कर आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्ववेद, नाट्यवेद इत्यादि के रूप में दृष्टिगोचर होता है। परंतु उक्त सभी ग्रन्थों का मूल वेद संहिताएँ ही प्रसिद्ध है। अत: इन्हें उपवेद कहा जाता है और इनकी प्रामाणिकता वेदों के ही ऊपर आधारित है।
ऋग्वेद, यजुर्वेद , सामवेद और अथर्ववेद ये चार मंत्र संहिताएँ ही वेद है- यह मान्यता सर्व सम्मत रही है। सृष्टि के आदि से ही सभी ऋषि, महर्षि व विद्वान उक्त मंत्र राशि को अपौरुषेय, नित्य और स्वत: प्रमाण मानते और कहते आए हैं। परंतु इस ‘अपौरुषेय’ शब्द को लेकर मतभेद होने से वैदिकों मे दो पक्ष हो गए। एक पक्ष का मत है की वेद का कर्त्ता कोई भी नहीं है, वे अनादि और नित्य है। इस पक्ष के लोग ईश्वर को सृष्टिकर्त्ता नहीं मानते, जगत को अनादि अनंत मानते हैं, सृष्टि व प्रलय को भी नहीं मानते। दूसरे पक्ष के मत मे ईश्वर सृष्टि-प्रलय का कर्त्ता और मंत्र संहिता रूप वेदों का प्रकाशक है। प्रत्येक सृष्टि की आदि मे वह मनुष्यों को वेद का ज्ञान देता है। ईश्वर नित्य है अत: उसका ज्ञान वेद भी नित्य है, इसलिए वेद स्वत: प्रमाण है। जगत मे उत्पन्न शरीरधारी कोई पुरुष वेदों का कर्त्ता नहीं है, इसलिए वेद अपौरुषेय कहलाते हैं –आदि।
परंतु दोनों ही पक्ष इस बात मे एकमत है की मंत्र राशि ही वेद हैं, वे अपौरुषेय, नित्य और स्वत:प्रमाण है।

ईश्वरवादी वैदिकों के अनुसार सृष्टि की आदि मे जो मनुष्य सर्व प्रथम होते हैं, वे बिना माता-पिता के संयोग के पृथ्वी के गर्भ में से उत्पन्न होते हैं। इसे अमैथुनी सृष्टि कहते हैं। ये मनुष्य शुद्ध, पवित्र, सतोगुण-प्रधान, निर्मल बुद्धि युक्त, राग द्वेष रहित, साक्षात कृद्धर्मा, समाहितचित्त योगी होते हैं। इन्हीं मे से चार मुख्य ऋषियों को परमेश्वर ने मंत्र प्रदर्शित किए। अग्नि ऋषि को ऋक्, वायु ऋषि को यजु:, आदित्य ऋषि को साम और अंगिरा ऋषि को अथर्व मंत्र राशि सुनाई पड़ी, जिसे सुनकर वे भी बोलने लगे। मंत्र राशि सुनी जाने के ही कारण श्रुति कहलाई। उक्त ऋषियों ने ध्यान योग से बुद्धि मे मंत्रराशि को देखा, इसीलिए वे मंत्रदृष्टा कहे जाते हैं। ईश्वरवादियों के अनुसार ज्ञान और भाषा दैवी प्रेरणा से ही मनुष्य को प्राप्त होते हैं, मनुष्य के वश की बात नहीं कि वह इन्हें बना सके।
इस उक्त मान्यता पर आक्षेप करने वाला तीसरा पक्ष भी है, जो वेदों को ईश्वर की देन न मानकर ऋषियों की देन मानता है। इसके अनुसार ऋषियों ने ही मंत्र बनाए हैं, भाषा भी उन्होने ही बनाई है और ज्ञान भी उन्होने ही दिया है, ईश्वर ने नहीं। अत: ऋषि लोग मंत्रदृष्टा नहीं, मंत्रकर्त्ता है। आज भी जो वेद की शाखाएँ है, वे किसी न किसी मनुष्य के नाम से प्रचलित है। यथा- शाकल, शौनक, तैत्तिर, पैप्पलाद, माध्यन्दिन, कौठुम आदि। इसके साथ ही वेद मंत्रों मे अनित्य पदार्थों, पुरुषों, राजाओं और ऋषियों के नाम मिलते है। यथा- गंगा, यमुना, सुदास, देवापि, शांतनु, वशिष्ठ, भरद्वाज, जमदग्नि आदि। इससे विदित होता है की इनके समय मे या इनके पश्चात ही वेदमंत्र बनाए गए अत: वे अपौरुषेय और नित्य नहीं है।

स्वामी दयानन्द सरस्वती भी ईश्वरवादी वैदिकों मे से ही है। वे भी वेदों को ईश्वरीय ज्ञान, अपौरुषेय (अमनुष्यकृत) नित्य और स्वत: प्रमाण मानते हैं और मंत्र संहिताओं को ही मूल वेद स्वीकारते हैं, अन्य ब्राह्मणों, शाखाओं को नहीं। उनके अनुसार ब्राह्मण, शाखादि सब मनुष्यकृत हैं अत: वे निर्भ्रांत और स्वत:प्रमाण के योग्य नहीं हो सकते। वे अनित्य हैं और वेदानुकूल होने पर ही उनका प्रमाण माना जाना चाहिए। उनका कहना है कि ऋषि या तो मंत्रदृष्टा होते हैं, या फिर मन्त्रार्थदृष्टा। कोई भी ऋषि मंत्रकर्त्ता नहीं है।

स्वामी दयानन्द जी की यह मान्यता उनकी स्वकल्पित नहीं है, अपितु ब्रह्मा से लेकर जैमिनी मुनि पर्यंत सभी वैदिकों की यही मान्यता रही है। इसपर होने वाले आक्षेप भी नए नहीं है, बहुत प्राचीन है। वैदिक विद्वानों ने सभी आक्षेपों के उत्तर दे दिये हैं। अब तक ऐसा एक भी आक्षेप शेष नहीं है जिसका उत्तर वैदिक विद्वानों द्वारा नहीं दिया गया है। वैदिक वाङ्मय के अध्ययन से यह सब जाना जा सकता है।

उन्हीं पुराने आक्षेपों, और आरोपों और प्रहारों को एकत्र करके वर्तमान मे कुछेक लोगों ने पुन: परोसना प्रारम्भ कर दिया है और ऐसा समझते हैं कि हमने बहुत बड़ा अन्वेषण और अनुसंधान कर डाला है, स्वामी दयानन्द को झूठा सिद्ध करने की धुन मे सारी आर्ष परंपरा को ही मिथ्यावादी कहने का दुस्साहस दिखाया है। परंतु ये स्वयं नालायक, अर्थात अयोग्य है। इनकी नीयत ठीक नहीं है, यह इनके लेखन से स्पष्ट विदित हो रहा है।
वेदों के ऊपर आक्षेप और प्रहार करने का कार्य नया नहीं, अति प्राचीन है।

नास्तिक चरवाक, वाममार्गी, आभाणक, बौद्ध, जैन, विदेशी और स्वदेशी मत-मजहब, वेदों पर कार्य करने वाले अनेक विदेशी तथाकथित विद्वान आदि लोगों ने अपनी पूरी शक्ति लगा कर वेदों और वैदिक मान्यताओं पर आक्षेप और प्रहार किए हैं। किसी ने उन्हें भाण्ड, धूर्त और निशाचरकृत कहा तो किसी ने गड़रियों के गीत कहा। किसी ने आत्मा को नहीं माना, किसी ने परमात्मा को नहीं माना। कोई लोक को नहीं मानता तो कोई परलोक को नहीं मानता इत्यादि। परंतु इन सबके उत्तर वैदिक विद्वानों द्वारा तर्क, युक्ति और प्रमाण पुरस्सर दिये जा चुके हैं। वैदिक षड्दर्शनो के अध्ययन से यह सब विदित हो जाता है।
जहां तक वेदों की अपौरुषेयता और नित्यता पर आक्षेप का प्रश्न है सो इसे जैमिनी मुनि ने अपने पूर्व मीमांसा ग्रंथ के प्रथमाध्याय मे ही सभी पूर्व पक्षियों का समाधान करते हुए सिद्ध किया है कि शब्द नित्य है, शब्द और अर्थ का संबंध नित्य है, वेद भी अपौरुषेय और नित्य है। उत्तर मीमांसा अर्थात वेदान्त दर्शन के प्रारम्भ मे ही महर्षि व्यास ने ब्रह्म अर्थात परमेश्वर को शास्त्र की योनि कहकर वेदों को ईश्वर प्रदत्त अपौरुषेय और नित्य सिद्ध किया है।

स्वामी दयानन्द के इस कथन पर कि ‘केवल मंत्र संहिता ही अपौरुषेय, नित्य और स्वत:प्रमाण है’, पं0 सत्यव्रत सामश्रमी ने अपने ऐतरेयालोचन ग्रंथ के पृष्ठ 127 पर लिखा है की ‘ऐसी कौन सी मंत्र संहिता है, जो शाखा नाम से रहित है जिसे महात्मा दयानन्द के अनुसार मूल वेद माना जावे-यह हमारी समझ मे नहीं आ रहा।
तात्पर्य यह है कि वर्तमान मे सभी वेद संहिताएँ किसी न किसी शाखा के ही नाम से प्रसिद्ध हैं। अत: मूल वेद कौन सी है- उसको कैसे जाना जाय? हमारा निवेदन है कि स्वामी दयानन्द ने इस जटिल समस्या का भी समाधान किया है। उन्होने जिन शाखा नाम से व्यवहृत संहिताओं को मूल वेद स्वीकार किया है, उनमे ऋग्वेद की शाकल, यजुर्वेद की माध्यंदिन, सामवेद की कौथुम संहिता है। अथर्ववेद की उस समय शौनक संहिता ही उपलब्ध थी अत: उसे ही ग्रहण कर लिया। इसका कारण यह था की शाकल्य ने अपनी संहिता के मंत्रों का केवल पद पाठ ही किया है, मंत्रों मे कोई घाल मेल नहीं किया। अत: स्वामी दयानन्द ने उसका सम्पूर्ण मंत्रभाग स्वीकार कर ऋग्वेद संहिता बना दिया। यजुर्वेद की सभी प्राप्य शाखाओं मे से माध्यन्दिन संहिता ही ऐसी थी जिसमे मंत्रभाग पूर्णत: सुरक्षित रखा गया, ब्राह्मण भाग का सम्मिश्रण नहीं था। माध्यन्दिन ने कर्मकांडीय सुविधा के लिए अनेक स्थानो पर कुछ प्रतीकें जोड़ी थी। बस इसीलिए वह माध्यन्दिन संहिता कहलाई। स्वामी दयानन्द ने उसकी प्रतीकें स्वीकार नहीं की। केवल मंत्र लेकर मूल यजुर्वेद प्राप्त कर लिया।

सामवेद की कौठुम और राणायनीय दो शाखाएँ प्राप्त थी। दोनों के मंत्रों मे कोई भेद नहीं, केवल गायन के ढंग मे अंतर था। अत: उन्होने कौठुम शाखा को ग्रहण करना उचित समझा। इस पर आगे भी अन्वेषण कार्य होना चाहिए।

जहां तक वेदों मे आए अनित्य पदार्थों, स्थानों और व्यक्तियों के नामों या अनित्य इतिहास होने के आक्षेप की बात है, सो इस विषय पर स्वामी दयानन्द ने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका मे पर्याप्त प्रकाश डाला है।

अनेक वैदिक विद्वानों ने भी इस विषय पर अनेक बड़े ग्रंथ लिखे हैं। इनमे पं0 ब्रह्मदत्त जिज्ञासु, युधिष्ठिर मीमांसक, शिवशंकर शर्मा, आचार्य वैद्यनाथ, डॉ0 रघुवीर वेदालंकार आदि के नाम उल्लेखनीय है। सबने सप्रमाण सिद्ध किया है की वेद मे अनित्य इतिहास नहीं है। पूर्व मीमांसा प्रथमाध्याय मे स्वयं जैमिनी मुनि ने—
1- वेदान्श्चैके सन्निकर्ष पुरुषाख्या॥ 1-1-27
2- अनित्यदर्शनाच्च ॥ 28
इन दो सूत्रों से पूर्वपक्ष रखकर
1- उक्तं तु शब्द्पूर्वत्वं ॥ 29
2- आख्या प्रवचनात् ॥ 30
3- परं तु श्रुति सामान्यम् ॥ 31
इन तीन सूत्रो द्वारा समाधान प्रस्तुत किया है, जिसे वहीं देखना चाहिए।

भाषा और ज्ञान को मनुष्यकृत कहने वालों से हमारा निवेदन है की आदि मानव जो सर्वप्रथम उत्पन्न हुए उनमें यदि बोलने का सामर्थ्य था तो शब्द भी अवश्य होंगे। यदि शब्द नहीं थे तो वे गूंगे होंगे। इसी प्रकार जब उनके कान थे तो ध्वनियाँ भी होंगी, जिनको वे सुनते थे। यदि नहीं सुनते थे तो बहरे होंगे। शब्द दो ही प्रकार के होते हैं, एक ध्वन्यात्मक, दूसरे वर्णात्मक। बोलना और समझना वाक् शक्ति है, आदि मानव उससे युक्त होना चाहिए। समझना और विचार करना- यह ज्ञान का द्योतक है और ज्ञान भाषा के विना नहीं होता। अत: विना ज्ञान के भाषा और विना भाषा के ज्ञान नहीं रह सकते। अत: यह मानना ही पड़ेगा कि ज्ञान और भाषा आदि मानव के साथ ही आए थे। ये उन्हें दैवी प्रेरणा या ईश्वरीय व्यवस्था से ही प्राप्त हुए थे। यही वेद हैं और अपौरुषेय है। भाषाओं का जन्म इसी आदि भाषा मे ही होता है। ध्यान रहे, संसार की समस्त भाषाएँ भाषा विकास का परिणाम नहीं है, ह्रास का परिणाम है। भाषा संकोच और अपभ्रंश होकर बढ़ती जाती है, कई बार तो मूल शब्द लुप्त हो जाता है और उसके अनेक अपभ्रंश प्रचलित रहते हैं। समस्त भाषाओं का यही हाल है। वे किसी एक मूल भाषा से ही अपभ्रंश होकर बनी है। वही आदि भाषा वेद वाणी है। इसीलिए सभी ऋषि मुनियों की सर्व सम्मत मान्यता रही है कि वेद अपौरुषेय, स्वत:प्रमाण ईश्वरप्रदत्त ज्ञान है।
उक्त मंत्र संहिताओं की वेद संज्ञा होने पर तो किसी को आपत्ति नहीं है। सर्व सम्मत है। परंतु कुछ लोग ब्राह्मण ग्रन्थों को भी वेद मानते और उनके भी स्वत: प्रमाण होने का आग्रह करते हैं। प्रमाण के रूप मे वे एक सूत्र उपस्थित करते हैं:- मंत्र ब्रह्मणयोर्वेदनामधेयम

ये लोग इसे कात्यायनकृत श्रौत सूत्र कहते हैं, परंतु यह कात्यायनीय श्रौत सूत्र मे नहीं मिलता। हाँ, कात्यायनकृत कहे जाने वाले प्रतिज्ञा परिशिष्ट मे पाया जाता है, किन्तु यह प्रतिज्ञा परिशिष्ट श्रौत सूत्र न होकर प्रतिशख्य से सम्बद्ध है। अत: विद्वान इसे कात्यायनकृत नहीं मानते। एक और महत्त्वपूर्ण विचारणीय बात यह है कि यह सूत्र केवल कृष्णयजुर्वेदीय श्रौत सूत्रों मे ग्रहण किया गया है। यथा आपस्तम्ब, सात्यषाढ, बौधायन आदि श्रौत सूत्रों मे उपलब्ध है। परंतु उनके भी परिभाषा प्रकरण मे पठित है। शुक्ल यजुर्वेद, ऋग्वेद और सामवेद से संबन्धित किन्ही श्रौत सूत्रों मे उपलब्ध नहीं होता। इससे विदित होता है कि यह इन्हीं कृष्णयजुर्वेदियों का ही बनाया हुआ है। परंतु अनेक आचार्यों ने इसे स्वीकार नहीं था, ऐसे प्रमाण भी उपलब्ध है। इसी सूत्र पर अपनी अपास्तम्ब श्रौतसूत्र की व्याख्या करने वाले हरदत्त और उससे भी पूर्व धूर्तस्वामी ने टिप्पणी दी है कि, ‘कैश्चिन्मंत्राणामेव वेदत्वमाख्यातम्’॥ अर्थात किन्हीं आचार्यों ने केवल मंत्रों का ही वेदत्व कहा है। इससे सिद्ध है कि प्राचीन आचार्य केवल मंत्रों की ही वेद संज्ञा स्वीकार करते थे और इस सूत्र रचना के पश्चात भी उन्होने इस परिभाषा को अंगीकार नहीं किया था। शुक्ल यजुर्वेदीयों आदि के यहाँ मंत्रराशि पृथक है और ब्राह्मण पृथक है, अत: इनके आचार्यों को इस ऐसे सूत्र की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। उन्हें यह संदेह ही न था कि कौन भाग मंत्र है और कौनसा भाग ब्राह्मण है।

परंतु कृष्ण यजुर्वेदियों ने अपनी संहिताओं, शाखाओं मे मंत्र और ब्राह्मण का घालमेल कर रखा है, इसीलिए उन्हें ऐसे सूत्र की आवश्यकता हुई। ध्यान देने की बात है कि उक्त सूत्र जहां भी है, परिभाषा प्रकरण मे ही पठित है। पारिभाषिक संज्ञाओं की रचना तभी की जाती है जब वे लोक मे प्रसिद्ध न हो अथवा अन्य शास्त्रों मे अन्य अर्थों मे प्रसिद्ध हों। जैसे कि पाणिनि मुनि रचित गुण, वृद्धि आदि संज्ञाएं और योग मे प्रयुक्त संयम आदि। परंतु ये संज्ञाएं उन्हीं ग्रन्थों मे प्रमाण मानी जाती हैं, जिनके लिए बनाई गयी होती हैं। अत: मंत्र और ब्राह्मण की वेद संज्ञा भी कृष्ण यजुर्वेदियों के याज्ञिक कर्मकांड तक ही सीमित रहेगी, सर्वत्र ग्रहीत नहीं होगी। जिनके श्रौत सूत्रों मे पठित है, वहीं मान्य होगी, सर्वत्र नहीं।

जहां तक ब्राह्मण भाग की प्रामाणिकता और अपौरुषेयता का प्रश्न है, सो वह अपौरुषेय तो है ही नहीं, क्योंकि वे तो कर्मकांड के आचार्यों द्वारा किए गए मंत्र विनियोगों की व्याख्या और याज्ञिक प्रक्रिया के विधिप्रदर्शन है। अत: पौरुषेय है। साथ ही इनमे समय-समय पर विनियोजित मंत्रों और प्रक्रियाओं मे फेरफार और उलट-पलट भी किया जाता रहा है और इनमे अनेक अवांछित और अनुचित प्रक्षेप भी घुसेड़ दिये गए हैं। अत: वे वेदों की भांति प्रामाणिक भी नहीं है। ब्राह्मण ग्रन्थों मे विभिन्न समयों मे हुए राजाओं, ऋषियों, आचार्यों तथा अन्य मनुष्यों के जीवन मे घटित घटनाओं का उल्लेख मिलता है अर्थात् अनित्य इतिहास विद्यमान है। इसलिए उनकी स्वत:प्रामाणिकता मानना दुराग्रह मात्र ही है। हाँ, उनके वेदानुकूल भाग अवश्य प्रमाण योग्य होंगे। छल और वितंडा का आश्रय लेकर सत्य का हनन या उसपर प्रहार करना सज्जन पुरुषों का कार्य नहीं हो सकता।

सा मा सत्योक्ति: परिपातु विश्वत: ॥

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