आर्य लेखक परिषद् देश के सभी राष्ट्रभक्त लेखको का आव्हान करती है ।

योगेश्वर श्रीकृष्ण (भाग ४)

श्रीकृष्ण के कार्य का परिणाम –

कृष्ण जी के नेतृत्व में लड़े गए महाभारत को देखने से ऐसा नहीं लगता कि कृष्ण ने कोई भला कार्य किया है । परिवारी जनों को परस्पर लड़ा कर संपूर्ण वंश का सर्वनाश करवा देना यह कौन सी बुद्धिमता है ? प्राय: लोगों के द्वारा ऐसे प्रश्न किए जाते हैं ।

वास्तव में श्रीकृष्ण ने वैदिक जीवन दर्शन के अनुसार ही कार्य किया । वैदिक दर्शन के अनुसार खून के रिश्ते वास्तविक नहीं होते, विचारों के रिश्ते ही सच्चे रिश्ते होते हैं । विचार धर्माधर्म के रूप में दो प्रकार के होते हैं जिससे हमारे विचार मिलते हैं वह हमारा मित्र या संबंधी होता है अन्यथा-पिता-पुत्र, पति-पत्नी, भाई-भाई परस्पर शत्रु हो जाते हैं, इतिहास इसका साक्षी है । खून के रिश्तो के मोह में लोग अपने थोड़े से स्वार्थ के लिए राष्ट्र का बड़ा भारी अहित करने को तैयार हो जाते हैं । श्रीकृष्ण कालीन खंड-खंड भारत में प्रायः सब लोग मोहग्रस्त हो रहे थे इसी कारण भारत खंड-खंड हुआ था । श्रीकृष्ण ने इसे पहचान लिया था और उन्होंने उस मोह से ऊपर उठकर अखंड भारत के निर्माण का सपना संजोया और उसे साकार भी किया । महाभारत के पश्चात् लगभग 4000 वर्षों तक बार-बार जोर लगाने के बावजूद भी विदेशी शक्तियां अखंड भारत को खंडित नहीं कर सकीं । यह श्रीकृष्ण के ही कर्मों का परिणाम था ।

हमारे देश में श्रीकृष्ण के स्वरूप को ठीक-ठीक कभी प्रस्तुत नहीं किया गया । जो स्वरूप प्रस्तुत किया गया वह बहुत घटिया है । आज आवश्यकता है उसके उसी वास्तविक गौरव पूर्ण स्वरुप को प्रदर्शित करने की जिससे हमारी भावी पीढ़ी उससे कुछ सीखकर समाज और राष्ट्र का कुछ हित कर सके ।

श्रीकृष्ण का व्यक्तिगत आचरण –

श्रीकृष्ण का जीवन जैसा महाभारत में मिलता है उससे उनके चरित्र का और शील का पता चलता है । उनकी दिनचर्या वैदिक धर्म के अनुसार थी । वे प्रतिदिन संध्या और हवन दोनों समय करते थे । दूत बनकर हस्तिनापुर गए तब मार्ग में सांयकाल संध्या, हवन का वर्णन है । इसी प्रकार दूसरे दिन कौरव सभा में जाने से पूर्व संध्या हवन करते हैं । जिस दिन अभिमन्यु मारा गया उस दिन भी सायंकाल संध्या वंदन करके शोक संतप्त पांडवों से जाकर मिलने का वर्णन है । इस से विदित होता है कि श्रीकृष्ण पूर्ण आस्तिक ईश्वर भक्त थे तथा वैदिक कर्मकांड में पूर्णतया निष्ठा रखते थे ।

शिष्टाचार और वृद्धजनों को सम्मान देने में भी अत्यंत विनीत और शिष्ट थे । व्यास, धृतराष्ट्र, कुंती तथा युधिष्टर आदि से जब मिले तब चरण छूकर नमस्ते बोल कर अभिवादन करने का वर्णन मिलता है । माता-पिता के प्रति भी बहुत प्रेम और आदर भाव रखते थे । जब भी घर जाते हैं, पहले माता-पिता के दर्शन करते हैं, चरण छूकर अभिवादन करके पश्चात पत्नी से मिलते हैं । बड़ों को झुककर अभिवादन और छोटों को गले लगाकर मिलते हैं । युद्धिष्ठिर के राजसूय में प्रथम पूज्य होकर भी जब कार्य बांटा गया तो श्रीकृष्ण ने ब्राह्मणों, विद्वानों के चरण धोने का कार्य अपने लिए आग्रह करके ग्रहण किया । विद्या में  वे संगोपाङ्ग वेद तथा विज्ञान के ज्ञाता थे । स्वयं भीष्म पितामह ने उन्हें उस समय के सब पुरुषों में श्रेष्ठ स्वीकार किया है । वे श्रीकृष्ण का बहुत ही आदर करते थे ।

रुक्मणी श्रीकृष्ण की धर्मपत्नी थी उसके साथ विवाह के पश्चात् श्रीकृष्ण उसे लेकर बदरिकाश्रम चले गए और वहाँ 12 वर्ष तक दोनों ने घोर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया । इसके पश्चात् शास्त्रविधि से गर्भाधान करके सनत् कुमार जैसा तेजस्वी पुत्र प्राप्त किया, जिसका नाम प्रद्युम्न था । भला ऐसा तपस्वी और संयमी पुरुष व्यभिचारी और परस्त्रीगामी कैसे हो सकता है ?

अतः श्री कृष्ण का जो चरित्र पुराणों में मिलता है वह सर्वथा झूठ है, मनगढ़ंत है और मानने के योग्य नहीं है । यदि श्रीकृष्ण का ऐसा पुराणोक्त चरित्र छात्रों को पढ़ाया जाता हो तो तत्काल पाठ्यक्रम से निकाल देना चाहिए ।

– समाप्त –

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