आर्य लेखक परिषद् देश के सभी राष्ट्रभक्त लेखको का आव्हान करती है ।

योगेश्वर श्रीकृष्ण (भाग ३)

–  वेदप्रिय शास्त्री

श्रीकृष्ण के कार्य –

7. सौभनगर की लड़ाई :-  शिशुपाल वध का समाचार सुनकर उसका एक मित्र मर्तिकावर्त (वर्तमान अलवर) का राजा शाल्व क्रोध से आग बबूला हो गया और द्वारका पर चढ़ाई कर दी । श्रीकृष्ण अभी हस्तिनापुर में ही थे । द्वारका वालों ने डटकर मुकाबला किया। कृष्ण पुत्र प्रद्युम्न के साथ ऐसा घोर संग्राम हुआ कि शाल्व को प्राण बचाकर भागना पड़ा । इधर श्रीकृष्ण जब द्वारका पहुंचे तो उन्हें शाल्व की दुष्टता का पता चला । उन्होंने कहा इस कांटे को और निकालना होगा । वे उससे लड़ने उसके घर पर ही पहुंच गए। परंतु शाल्व वहाँ नहीं था । वह अपने विमान में बैठ कर समुद्र तट पर विहार करने गया था । श्रीकृष्ण ने उसे वही जा घेरा । भीषण संग्राम हुआ । शाल्व मायावी था और उसके पास एक विमान भी था जिसमें पर्याप्त सैनिक भी बैठ सकते थे । अतः यह जमीन और आसमान का युद्ध हो गया । श्रीकृष्ण नीचे लड़ रहे थे और वह आकाश से । एक बार तो श्रीकृष्ण मूर्छित हो गए परंतु क्षण भर में ही पुनः सचेत होकर आग्नेय अस्त्र से शाल्व के विमान को मार गिराया । नीचे गिरते ही साल को परलोक पहुंचा दिया इस प्रकार द्वारका के साथ-साथ इंद्रप्रस्थ को भी लगभग शत्रु रहित कर दिया । परंतु अभी तो कुछ और ही होना था ।

युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में दुर्योधन और शकुनि भी आए थे उन्होंने वहाँ युधिष्ठिर का वैभव देखा तो उनसे सहन नहीं हुआ । शिशुपाल का वध जिस प्रकार हुआ, उसे देखकर भी वे सशंकित हो उठे । उन्होंने हस्तिनापुर लौटकर परस्पर मंत्रणा की और यह तय किया कि युधिष्ठिर को जुआ खेलने के लिए निमंत्रित किया जाए और छल पूर्वक उससे उसका राज्य जीत लिया जाय क्योंकि युद्ध से तो वह कदापि संभव न होगा । अतः यही हुआ, श्रीकृष्ण तो उधर शाल्व से युद्ध करने चले गए और इधर युधिष्ठिर सारा राज्य जुए में हार गए । यही नहीं चारों भाइयों और खुद को हारने के बाद द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया और हार गए । द्रौपदी जो उन दिनों रजस्वला और एक वस्त्रा थी, उसे जबरन घसीट कर सभा में लाया गया परंतु द्रौपदी की बुद्धिमत्ता से किसी प्रकार युधिष्ठिर सहित सभी पांडव दासता से मुक्त हो गए किंतु राज्य छोड़कर 13 वर्ष का वनवास जिसमें 1 वर्ष का अज्ञातवास में शामिल था, शर्त के अनुसार भोगना पड़ा । इस प्रकार की युधिष्ठिर की मूर्खता से एक साम्राज्य जो बड़े प्रयत्नों से बना था, फिर से दुष्टों के हाथ में चला गया । श्री कृष्ण को जब यह पता लगा तो वे बड़े दुखी हुए और क्रुद्ध भी । द्रौपदी उनसे मिलकर बहुत रोई और सारी व्यथा कह सुनाई । श्रीकृष्ण ने उसे सांत्वना दी और कहा कि मैं होता तो यह सब नहीं होने देता अब तो धैर्यपूर्वक ही समस्या से निपटना होगा ।

आखिरकार पांडवों को 12 वर्ष जंगलों की खाक छाननी पड़ी और तेरहवाँ वर्ष राजा विराट (जयपुर के पास) के यहां गुप्त रहकर बिताया । जब 13 वर्ष बीत गए तब उन्होंने विराट के राजा को अपना परिचय दिया । विराट ने अपनी पुत्री उत्तरा का विवाह अभिमन्यु से करने का निश्चय किया । इसी शुभ अवसर पर पांडव पक्ष के संपूर्ण राजा एकत्र हुए और वहीं पर मंत्रणा करते यह निश्चय किया गया कि हस्तिनापुर चलकर पांडवों का उनका राज्य वापस दिलाया जाये । यदि राजी से यह संभव ना हो तो युद्ध किया जावे । अतः इधर आप सब लोग युद्ध की तैयारी करें, उधर श्रीकृष्ण को हस्तिनापुर दूत बनाकर भेजा जाए।

8. श्रीकृष्ण का दूतकर्म :- पांचाल राज्य के पुरोहित पहले हस्तिनापुर भेजे गए ।  उन्होंने पांडवों को उनका राज्य भाग लौटाने को कहा परंतु दुर्योधन नहीं माना । धृतराष्ट्र ने संजय को दूत बनाकर पांडवों के पास भेजा । संजय ने युधिष्ठिर को वैराग्य का उपदेश देना प्रारंभ किया कि संसार नश्वर है, इसके लिए लड़ाई करना अच्छा नहीं । श्री कृष्णा संजय को करारा उत्तर दिया । उन्होंने कहा “संजय ! यह वैराग्य का उपदेश उस दिन शकुनि और दुर्योधन को क्यों नहीं दिया था, जब जुए में छल कर रहे थे और जब द्रौपदी को निर्वस्त्र कर रहे थे । जाओ कह देना धृतराष्ट्र से क्षत्रिय कभी अपना अधिकार नहीं छोड़ा करते । अब मैं हस्तिनापुर स्वयं जाऊंगा और दुर्योधन को समझाऊँगा समझ गया तो ठीक है अन्यथा फिर भीम की गदा और अर्जुन के बाण ही निर्णय करेंगे 

श्री कृष्ण हस्तिनापुर के लिए चल पड़े । एक रात रास्ते में काटी, वही संध्या वंदन किया । अगले दिन हस्तिनापुर पहुंच कर, सबसे पहले राजा धृतराष्ट्र से मिले, फिर बुआ कुंती से मिले और उसे सांत्वना दी । इसके पश्चात दुर्योधन से मिले दुर्योधन ने बड़ा स्वागत सत्कार किया और भोजन के लिए आग्रह किया, परंतु श्रीकृष्ण ने भोजन ग्रहण करने से मना कर दिया । कारण पूछने पर श्री कृष्ण ने कहा “भोजन खिलाने में दो भाव काम करते हैं, एक दया और दूसरी प्रीति । दीन हम हैं नहीं और प्रीति आप में है नहीं । आप अपने पांडव भाइयों से ही द्वेष करते हैं, उनका अधिकार छीनते हैं तो हमें क्या खिलायेंगे । हाँ, कल सभा में यदि हमारा कार्य सिद्ध हो गया और आपने हमारी बात मान ली तो भोजन भी कर लेंगे।

उस रात श्रीकृष्ण विदुर के यहां ठहरे । विदुर ने कहा “आप व्यर्थ आए हैं, ये आप की न सुनेंगे न मानेंगे । व्यर्थ आपकी अप्रतिष्ठा होगी ।” यह सुनकर श्री कृष्ण गंभीर होकर बोले- “मुझे इनकी दुष्टता का पूरा ज्ञान है परंतु सारी धरती खून से लथपथ होगी यह सोचकर मुझ से रहा नहीं गया । मैं अपने कर्तव्य का पालन करूंगा, इन्हें समझाऊँगा । यदि ये मान जाते हैं तो मुझे बड़ा पुण्य होगा, नहीं मानते तो मेरे शिर से कर्तव्य का भार उतर जाएगा । फिर कोई और नहीं कहेगा कि कृष्ण चाहता तो इन्हें युद्ध करने से रोक सकता था परंतु उसने ऐसा नहीं किया ।”

प्रात: काल हुआ श्रीकृष्ण ने स्नान करके संध्या और हवन किया फिर धृतराष्ट्र की सभा में जा पहुंचे । सारी सभा में सन्नाटा छाया हुआ था । श्रीकृष्ण ने खड़े होकर धृतराष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा- राजन् ! आपका कुल भारतवर्ष में श्रेष्ठ माना जाता है । इस समय आप इसके मुख्य हैं परंतु आपकी संतान बिगड़ रही है । आपके पुत्र जो अधर्म युक्त आचरण में लगे हुए हैं, उसके कारण इस कुल में बड़ी भारी आपत्ति आने वाली है । आप चाहें तो इसे बचा सकते हैं । इस समय भारत का भाग्य एक और आप के अधीन है और दूसरी और मेरे । आप अपने पुत्रों को समझालें, मैं पांडवों को समझा दूँगा तो यह खून खराबा रुक सकता है । दुर्योधन को कहो कि पांडवों को उनका भाग सौंप दें । इस प्रकार यदि कौरव-पांडव मिलकर एक हो जाते हैं तो संसार की कोई बड़ी शक्ति उनका सामना नहीं कर सकेगी ।

श्रीकृष्ण ने फिर दुर्योधन को बहुत समझाया परंतु वह नहीं माना । तब श्रीकृष्ण ने डाँटते हुए कहा- तू ने भीम को विष दिया, लाख का घर बनवा कर पांडवों की हत्या का षड्यंत्र किया । जुए का निमंत्रण ही अपराध है फिर तूने उसमें छल कपट किया, यही नहीं तूने मातृतुल्य भाभी द्रोपदी का भी अपमान किया, तू एक अपराधी है और अब नहीं मानता तो अपने अपराध का दंड भुगतने के लिए तैयार हो जा । अब तो युद्ध ही होगा ।

यह कह कर श्रीकृष्ण धृतराष्ट्र से विदा लेकर कुंती के पास गए। कुंती ने कहा – कृष्ण ! मेरे पुत्र तेरे पास धरोहर हैं, उनकी रक्षा करना । श्रीकृष्ण ने उसे धैर्य दिया, चरण छुए और कर्ण के निवास की ओर चल पड़े। रास्ते में कर्ण मिल गया तो उसे अपने समीप रथ पर बैठा लिया, फिर बोले- कर्ण! तुम्हें पता है, कि तुम सुत पुत्र नहीं हो, पांडव तुम्हारे भाई हैं। तुम युधिष्ठिर से बड़े हो, चाहो तो पांडवों की और आ जाओ। वे तुम्हें सम्राट बना देंगे। यह नरसंहार भी रुक सकता है। दुर्योधन तुम्हारे बल पर ही अकड़ रहा है।

कर्ण ने अपनी असमर्थता जताई, परंतु कहा मैं सब जानता हूँ, कौरवो का आचरण धर्म संगत नहीं है और युद्ध हुआ तो जीतेंगे नहीं, हारेंगे परंतु मैं विवश हूँ, अब इन्हें नहीं छोड़ सकता।

श्रीकृष्ण की बात तो कौरव पक्ष ने नहीं मानी परंतु उनके भाषण से कौरव पक्ष का नैतिक पक्ष कमजोर हो गया इससे उनका मनोबल क्षीण हो गया। स्वयं करण के साथ सारा हस्तिनापुर यही कह रहा था कि युद्ध हुआ तो विजय अर्जुन की ही होगी।

9. अर्जुन के सारथी :-  श्रीकृष्ण का यादव कुल दो भागों में बट गया था । एक पक्ष कौरवों की ओर था तो दूसरा पांडवों की ओर । स्वयं बलराम जो कृष्ण के बड़े भाई थे, दुर्योधन की ओर झुके हुए थे क्योंकि वह उनका शिष्य था । अतः श्री कृष्ण ने यह निर्णय लिया कि वह युद्ध नहीं करेंगे, केवल अर्जुन का रथ चलायेंगे । वे अपनों पर हाथ नहीं उठाना चाहते थे इस नीति से वह यादव कुल के प्रिय भी बने रहे और पांडवों के पक्षधर भी। बलराम श्रीकृष्ण के विरोध में भी नहीं जाना चाहते थे अतः वे तीर्थ यात्रा के लिए चले गए ।

10. महाभारत प्रारंभ, अर्जुन को उपदेश :- आखिर वही हुआ जिसकी आशा थ । रणभेरी बज उठी । दोनों तरफ की सेनाएँ आमने सामने खड़ी थी । एक तरफ अर्जुन और उसके सारथी श्रीकृष्ण । दूसरी ओर पितामह भीष्म । अपने ही परिवार और सगे-संबंधियों को आमने सामने एक दूसरे की हत्या के लिए समुद्यत देख अर्जुन मोहग्रस्त हो गया। उसने युद्ध करने से इंकार कर दिया। तब श्रीकृष्ण को उसे समझाना पड़ा । बड़ी कठिनाई से वह युद्ध करने के लिए तैयार हुआ । श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया यही उपदेश गीता के नाम से विख्यात हो चुका है । इसे वैष्णव ने बहुत ही भ्रष्ट कर दिया है । यह उन्होंने श्रीकृष्ण को परमात्मा सिद्ध करने के लिए किया है ।

अर्जुन का यह मोह लगभग पूरे युद्ध में देखने को मिलता है । परंतु श्रीकृष्ण की यही विशेषता है कि उन्होंने इस युद्ध का संचलान बड़ी ही कुशलता से करवाया और खंड-खंड भारत को एक बार तो अखंड बना कर ही दम लिया । कुल 18 दिनों तक युद्ध चला, इसमें अनेक उतार-चढ़ाव आए, कई बार विचलित होते, घबराए वह हताश होते पांडवों को श्रीकृष्ण ने पग-पग पर अपनी नीति और बुद्धि कौशल से संभाला और हर संकट व समस्या का उपाय निकाल कर उसे सुलझाया यही उनका महान कार्य है जो उन्हें एक अद्वितीय और अनुपम महापुरुष के पद पर प्रतिष्ठित करता है ।
भारतीय राजनीति में उपाय और कर्म कौशल को योग कहा जाता था महाभारत में भी योग का यही अर्थ ग्रहण किया गया है। श्रीकृष्ण उपायज्ञ होने से ही योगेश्वर कहे गए हैं। घोर संकट में जब सब किंकर्तव्यविमूढ़ हो, बुद्धि काम न करती हो, तब जो बिना विचलित हुए उपाय खोजले वही योगी है और जो उपाय खोजने की कला में दक्ष हो वह योगेश्वर है। जैसा कि शब्दकोश में भी योग का यही अर्थ किया है कि “योग: संहननोपाय ध्यान संगति युक्तिषु” अर्थात् योग का अर्थ है- संहनन, उपाय, ध्यान और युक्ति।

क्रमशः

Please follow and like us:

About the author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Show Buttons
Hide Buttons