आर्य लेखक परिषद् देश के सभी राष्ट्रभक्त लेखको का आव्हान करती है ।

योगेश्वर श्रीकृष्ण (भाग २)

–  वेदप्रिय शास्त्री

श्रीकृष्ण के कार्य –

1. स्वकुल संगठन :-  सबसे पहले श्रीकृष्ण जी ने यादवों के 17 वंशों को पारस्परिक कलह व फूट से मुक्त कराकर उन्हें संगठित किया । इस हेतु उन्होंने यादवों के एक दल के नेता आहुक की पुत्री का विवाह दूसरे दल के युवा नेता अक्रूर के साथ करवा दिया और इस तरह दो- प्रतिद्वंदी परस्पर संबंधी बन गए। दोनों दल परस्पर मिलकर पुनः एक हो गए । इस संगठित संघ ने आगे चलकर जरासंध के लगातार 17 आक्रमण झेले और हर बार उसको निराश होकर वापस जाना पड़ा ।
द्वारका प्रस्थान –  अंततः श्री कृष्ण जी ने जब देखा कि एक महाशक्ति से अकेले यादव कब तक लड़ेंगे, एक न एक दिन परास्त होना पड़ेगा, तो उन्होंने यादवों को समझाया कि 300 वर्ष तक लड़कर भी हम जरासंध से जीत नहीं सकते। अतः यहां से दूर किसी सुरक्षित स्थान में रहें और अपनी स्थिति को  सुदृढ़ करें। सबकी राजी से द्वारका को यादवों की राजधानी बनाया गया। यहां से श्रीकृष्ण का संगठन कार्य प्रारंभ होता है। श्रीकृष्ण चाहते तो स्वयं राजा बन सकते थे परंतु ऐसा ना करके वह यादवो के और अधिक प्रिय हो गए ।

2. रुक्मणी विवाह :-  जरासंध का एक साथी बड़ा राजा था विदर्भराज भीष्मक। उसकी पुत्री रुक्मणी श्रीकृष्ण के शील गुणों पर आसक्त थी परंतु उसका पिता व भाई श्री कृष्ण के साथ उसका विवाह नहीं कराना चाहते थे। श्रीकृष्ण भी रुकमणी पर मुग्ध थे। जरासंध ने रुक्मणी का विवाह अपने सेनापति चेदिराज शिशुपाल से करवाने का निश्चय किया। सम्बन्ध तय हो गया, बारात आ पहुंची । परंतु इससे पूर्व भी श्रीकृष्ण रुक्मणी को उसके पिता के घर से किसी प्रकार निकाल लाए। जब बाराती राजाओं को पता लगा तो उन्होंने श्रीकृष्ण का रास्ता रोकना चाहा परंतु श्री कृष्ण सबको अपने युद्ध कौशल से परास्त कर दिया । रुकमणी के भाई रुक्मी पर तो इतना प्रभाव पड़ा कि वह सदा के लिए श्रीकृष्ण का होकर रह गया। इस प्रकार एक और बड़ा राज्य यादव संघ के साथ मिल गया और श्रीकृष्ण की शक्ति सुदृढ़ हुई। श्रीकृष्ण ने घर आकर रुक्मणी से विधिवत विवाह किया ।

3. द्रौपदी स्वयंवर और पांडव मिलन :-  श्रीकृष्ण ने अपनी फूफी कुंती के पांच पुत्रों की वीरता के बारे में सुन रखा था परंतु पांडव उस समय भारी संकट झेल रहे थे । धृतराष्ट्र का बड़ा पुत्र दुर्योधन पांडवों को मार डालना चाहता था, क्योंकि पांडव आधे राज्य के अधिकारी थे । यदि सम्मिलित राज्य चलता तो युधिष्ठिर राजा बनते क्योंकि वह सब में बड़े थे । दुर्योधन पांडवों को राज्य का तनिक भी भाग देना नहीं चाहता था। उसने पांडवों को मारने के अनेक प्रयत्न किए परंतु हर बार वे सुरक्षित बच जाते थे । अंततः उसने एक लाक्षा गृह बनाया और किसी बहाने कुंती समेत पांचों पांडवों को उसमें विश्राम हेतु ठहरा दिया । परंतु विदुर को इस षड्यंत्र का पता चल गया था और उसने गुप्त रीति से भवन के नीचे एक सुरंग बनवादी थी तथा पांडवों को सूचित कर दिया था। आधी रात को उस भवन में आग लग गई। पांडव तो सुरंग के मार्ग से सुरक्षित बाहर निकल गए परंतु दुर्योधन ने समझा कि वे मर गए ।

इस प्रकार पाँचो पांडव अपनी मां के साथ भेद छुपाए इधर-उधर भटकते अपना निर्वाह कर रहे थे । इसी काल में पांचाल राज द्रुपद ने अपनी पुत्री याज्ञसैनी (द्रौपदी) का विवाह करने के निमित्त एक आयोजन किया, जिसमें संसार भर के वीरों के समक्ष यह शर्त रखी गई थी जो चक्र में बन्धी ऊपर घूमती मछली को नीचे तेल में प्रतिबिंब देखकर भेद देगा, द्रौपदी उसे ही अपना पति वरण कर लेगी ।

इस आयोजन में श्रीकृष्ण भी गए हुए थे और पांडव भी ब्राह्मण वेश में वही विराजमान थे । जब सभी क्षत्रिय राज्य लक्ष्य भेद करने में असफल रहे तब ब्राह्मण वेशधारी अर्जुन उठे और सबके देखते-देखते लक्ष्य को वेध दिया । द्रौपदी ने आगे बढ़कर अर्जुन के गले में माला डाल दी। इस पर राजाओं ने बड़ा विरोध किया । कुछ देर युद्ध भी हुआ परंतु अर्जुन अजय रहे । श्रीकृष्ण ने राजाओं को समझाया कि भाई उसे अपनी वीरता का पुरस्कार प्राप्त करने दो । वहां से चलकर श्रीकृष्ण चुपचाप पांडवों के पीछे-पीछे उनके पड़ाव पर जा पहुंचे । फूफी कुंती और बड़े भाई युधिष्टर के चरण छू कर अपना परिचय दिया कि मैं कृष्ण हूँ । कुंती और पांडवों की प्रसन्नता का पारावार उमड़ पड़ा । उन्होंने अर्जुन और भीम को युधिष्ठिर से मांगा और उन्हें साथ लेकर मगध राज्य गए और किसी प्रकार जरासंध और भीम का परस्पर मल्ल युद्ध करा कर उसे मरवा डाला और उसके पुत्र सहदेव को महाकाल राजा बना दिया ।

4. छियासी  राजाओं की मुक्ति :-  जरासंध ने छियासी राजाओं को कैद में डाल रखा था । श्रीकृष्ण ने जरासंध की मृत्यु के तत्काल बाद उन सभी राजाओं को मुक्त करा दिया । वे बड़े प्रसन्न हुए और श्री कृष्ण जी से अपने योग्य सेवा कार्य बताने का निवेदन किया । श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में उपस्थित होने का आदेश देकर उन्हें विदा दी । इस प्रकार 86 राजा तो श्रीकृष्ण के साथ आ ही गए और भी बहुत से राजे जो जरासंध की अधीनता भयवश स्वीकार कर चुके थे, वे भी की युधिष्ठिर के पक्ष में आ मिले । धर्म का पक्ष और अधिक सुदृढ़ हुआ और खंड-खंड भारत अखंडता की ओर अग्रसर हुआ ।

5. नारी मुक्ति :-  प्राग्ज्योतिष (वर्तमान असम) का राजा नरक जो जरासंध का मित्र था, उसने 16000 से अधिक सुंदर स्त्रियों का अपहरण करके बंदी बना रखा था और उनके साथ बलात्कार करता, करवाता था । श्रीकृष्ण ने उसे मार कर सभी युवतियों को मुक्त करा दिया । इस कार्य से संसार भर कि नारी जाति के ह्रदय में अपना आदर पूर्ण स्थान बना लिया और भारत को अखंड बनाने में उनका योगदान प्राप्त किया ।

6. शिशुपाल वध :-  श्रीकृष्ण ने जरासंध का वध कराकर युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ का मार्ग साफ कर दिया था और अब यह स्थिति बन गई थी कि खंड-खंड भारत को जोड़कर एक सम्राट के शासन को सुव्यवस्थित किया जा सके । अत: राजसूय यज्ञ की घोषणा हो गई । सभी राजाओं को निमंत्रण भेज दिया गया । सब लोग दल बल के साथ सम्राट के लिए उपहार लेकर यज्ञ में पधारे । आतिथ्य के समय यह प्रश्न उठा कर सर्वप्रथम किस का सत्कार हो ? तब वहां उपस्थित भीष्म आदि सब वृद्धजनों एवं विद्वानों ने यह परामर्श दिया कि सर्वप्रथम श्रीकृष्ण का ही सत्कार होना चाहिए ।

यह सुन कर चेदिराज शिशुपाल जो कि था तो श्रीकृष्ण की बुआ का पुत्र परंतु श्रीकृष्ण से भयंकर द्वेष करता था, वह भड़क उठा । उसने पहले तो श्रीकृष्ण को खूब गालियां दी और फिर उन को युद्ध के लिए चुनौती दे डाली, साथ ही राजाओं को विद्रोह के लिए भी भड़काया। यह शिशुपाल जरासंध की सेना का सेनापति था जरासंध की मृत्यु के पश्चात उसके पुत्र सहदेव के साथ अनिच्छा से ही विवश होकर यज्ञ में आया था ।
श्री कृष्ण ने देखा कि यह रंग में भंग करेगा तो वह खड़े हो गए और सर्वप्रथम सभी राजाओं को संबोधित करते हुए शिशुपाल के अपराध के गिनाए और उसके बाद सुदर्शन चक्र के एक ही वार में ही उसका शिर काट डाला । उसी दिन उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया और उसके पुत्र का राज्याभिषेक भी कर दिया गया । यज्ञ तो संपन्न हो गया परंतु भविष्य के लिए अनेक संकटो के बीज बो गया ।

क्रमशः

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