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योगेश्वर श्रीकृष्ण (भाग १)

– वेदप्रिय शास्त्री

श्रीकृष्ण नाम सुनते ही हमारी आंखों के सामने दो तरह के चरित्र उपस्थित हो जाते हैं। एक है ‘चौर जार शिखामणि’ अर्थात चोरों और व्यभिचारयों का शिरोमणि, बांसुरी बजाने वाला, रासलीला करने वाला, परनारियों का अभिमर्षक, धूर्त और लंपट चरित्र जिससे किसी भी प्रकार से आदर्श नहीं बनाया जा सकता, भले ही वह परमात्मा का अवतार ही क्यों न हो। उसे महापुरुष तो क्या एक साधारण अच्छा नागरिक भी स्वीकार नहीं किया जा सकता।

दूसरा चरित्र है – एक हाथ में पाञ्चजन्य शंख और दूसरे हाथ में सुदर्शन चक्र उठाए योगेश्वर का। यह है तत्कालीन भारत का भाग्य विधाता, वैदिक संस्कृति का उद्गाता और त्राता, महाराज युधिष्ठिर का मंत्री, पाण्डव साम्राज्य का निर्माता और महाभारत का श्रेष्ठपुरुष श्रीकृष्ण।

पहले चरित्र का चित्रण पुराणों ने किया है और दूसरे का चित्रण महाकवि कृष्ण द्वैपायन व्यास के महाभारत ने। विचारणीय यह है कि हमारे लिए कौन सा स्वरूप आदर्श और अनुकरणीय हो सकता है ? दोनों स्वरूपों में से श्रीकृष्ण का वास्तविक स्वरुप कौन सा है ? महर्षि दयानंद इन प्रश्नों का समाधान करते हैं। वे लिखते हैं – “देखो श्रीकृष्ण जी का इतिहास महाभारत में अत्युत्तम है। उनका गुण, कर्म, स्वभाव और चरित्र आप्त पुरुषों के सदृश है, जिसमें अधर्म का आचरण अर्थात श्रीकृष्ण ने जन्म से मरण पर्यन्त बुरा काम कुछ भी किया हो, ऐसा नहीं लिखा। परन्तु इस भागवत वाले ने अनुचित मनमाने दोष लगाए हैं। इस को पढ़-पढ़ा और सुन-सुना कर अन्य मत वाले लोग श्रीकृष्ण जी की बहुत सी निंदा करते हैं। जो यह भागवत न होता तो श्रीकृष्ण जी के सदृश महात्माओं की झूठी निंदा क्यों कर होती?” अतः सिद्ध है कि पुराणों में वर्णित श्रीकृष्ण चरित्र सर्वथा झूठा है और राष्ट्र के लिए अनुकरणीय नहीं है, अतः त्याज्य है। अब हम महाभारत में वर्णित श्री कृष्ण के उस वास्तविक चरित्र की थोड़ी सी झांकी प्रस्तुत करते हैं जिसका अनुकरण करके कोई भी राष्ट्र एक जीवित और सुदृढ़ राष्ट्र बन सकता है।

प्रत्येक राष्ट्र का अपना एक जीवन दर्शन या तत्व ज्ञान होता है। उसी को आधार बनाकर राष्ट्र धर्म की स्थापना होती है। इसी राष्ट्र धर्म के अनुसार लौकिक-पारलौकिक-नीति, शत्रु-मित्र-व्यवहार, कर्त्तव्याकर्त्तव्य का निर्णय व्यक्ति और समाज तथा देश देशांतर व्यवहार का निर्धारण किया जाता है। इसकी क्रियात्मकता और आचरण में त्रुटि होने पर, प्रमाद होने पर राष्ट्र पतित् होकर नष्ट हो जाते हैं। महापुरुष उसी तत्वज्ञान को अपने पराक्रम, पुरुषार्थ, बुद्धिमता, कुशलता और व्यवहारिकता के द्वारा पतन के गर्त में जाते हुए राष्ट्र को पुनः प्रतिष्ठित का नवीन स्फूर्ति प्रदान करते हैं। वे राष्ट्र धर्म की पुन: स्थापना करते हैं। पश्चात लोग उनका अनुकरण करते हुए अपने जीवन पथ का निर्माण करते हैं और आगे बढ़ते हैं श्री कृष्ण जी ऐसे ही महापुरुषों की श्रेणी में आते हैं वह स्वयं गीता में कहते हैं –
यद्  यद्  आचरति श्रेष्ठस्तत् तदेवेतरे जनः ।
स  यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ।।

अर्थात श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही करते हैं। वह जिसे प्रमाण मान लेता है, संसार भी उसी का अनुवर्तन करने लगता है। श्रीकृष्ण कौन थे, उन्होंने क्या किया ? यह सब जानने से पूर्व यह जानना आवश्यक है कि श्रीकृष्ण के कार्य क्षेत्र में आने से पूर्व भारत राष्ट्र की अवस्था कैसी थी ?

महाभारत युद्ध से पूर्व यह भारत देश अनेक छोटे- बड़े राज्यों में बँटा हुआ था। हस्तिनापुर जो कभी चक्रवर्ती आर्य शासन का केंद्र था, वह जर्जर हो चुका था। महाभारत धृतराष्ट्र नामक नेत्रहीन राजा गद्दी पर बैठा हुआ था। उस के जेष्ठ पुत्र दुर्योधन और छोटे भाई पाण्डु के पाँच पुत्रों युधिष्ठरादि के साथ राज्य को लेकर भारी संघर्ष चल रहा था। अतः उसके अधीन अनेक राजाओं ने उसकी संप्रभुता से अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया था। अनुशासन और प्रशासन नाम मात्र को शेष थे।

मगध (वर्तमान बिहार) के राजा जरासंध ने देश के छियासी राजाओं को कैद में डाल दिया था और भारत की एक बड़े भाग का बलपूर्वक सम्राट बना हुआ था उसने अपनी दो पुत्रियों – अस्ति और प्राप्ति का विवाह मथुरा में उग्रसेन के पुत्र कंस के साथ करके उसे वहाँ का सम्राट बना दिया था। कंस ने अपने पिता को गद्दी से उतार कर जेल में डाल रखा था। इसके साथ ही अपने बहन-बहनोई को भी नज़र कैद कर रखा था। इस प्रकार संपूर्ण भारत में अराजकता, अत्याचार और पारस्परिक फूट व कलह का साम्राज्य था। धर्म नाम मात्र को शेष था, उसकी दुहाई दी जाती थी परंतु आचरण में नहीं था। प्रत्येक सिद्धांत की व्याख्या स्वार्थ सिद्धि की दृष्टि से की जाने लगी थी। धर्म बल या न्याय बल के ऊपर पाशविक बल प्रबल हो रहा था। ऐसे विकट समय में हमारे चरित नायक का अवतरण हुआ।

श्रीकृष्ण के समान बुद्धिमान, कर्मकुशल, अद्भुत सूझबूझ वाला, उपायज्ञ, व्यवहार कुशल, निश्चिंत और पराक्रमी पुरुष आज तक इस संसार में पैदा नहीं हुआ। धर्मशास्त्र एवं वैदिक राजनीति का इतना बड़ा पंडित अन्यत्र दिखाई नहीं पड़ता। यह एक ऐसा विलक्षण व्यक्तित्व है जिसने अपने स्वपन को जीते जी साकार होते हुए देखा, जिसने अपना लक्ष्य प्राप्त किया और जीवन को सफल व धन्य किया । एक ऐसा व्यक्तित्व जो सदा मुस्कुराता है, भारी से भारी संकटों का सामना करते हुए भी जो न कभी टूटता है, ना झुकता है और ना ही मोहग्रस्त होता है । वह कभी जय-पराजय की चिंता नहीं करता, सांसारिक पदार्थों की आसक्ति छू तक नहीं गई, निजी पीड़ा का कभी ध्यान ही नहीं करता। इसे अपनी योजना और अपने बुद्धि कौशल पर पूरा भरोसा है, निराशा और पलायन की प्रवृत्ति को कभी भी अपने पास फटकने नहीं देता। सचमुच अद्वितीय आदर्श पुरुष है यह, इसमें किंचित भी अतिशयोक्ति नहीं है।

श्रीकृष्ण का जन्म स्थान और वंश –

भारत में सूर्य और चंद्र वंश के नाम से दो क्षत्रिय कुल विख्यात हैं। चंद्रवंश में ययाति नाम के बड़े प्रतापी राजा हुए हैं। ययाति के बड़े पुत्र यदु राजा हुए। उन्हीं के वंश में उत्पन्न होने के कारण श्रीकृष्ण यदुवंशी क्षत्रिय कहे जाते हैं। कालांतर में इसी वंश में मधु नामक राजा हुए, इनके वंशज होने से यादव माधव कहलाए। आगे चलकर इसी वंश में सत्वत् नाम के बड़े प्रसिद्ध राजा हुए। सत्वत् के पुत्रों से दो उपवंश चले एक अन्धक और दूसरा वृष्णि। श्रीकृष्ण वृष्णि वंशी थे इसलिए उनका एक नाम वार्ष्णेय भी है।

राजा अन्धक जिन्हें भोज या महाभोज भी कहते थे, उनके दो पुत्र हुए कुकुर और भजमान। श्रीकृष्ण की माता देवकी कुकुर वंश की थी और पिता वासुदेव वृष्णि वंश के थे। श्रीकृष्ण के पितामह का नाम शूर,  पिता का नाम वसुदेव तथा माता का नाम देवकी था। इनका जन्म वर्तमान उत्तर प्रदेश में यमुना के किनारे पर बसे मथुरा नामक नगर में हुआ था। मथुरा और उसके आसपास यादवों के कुल सत्रह उपवंश बसे हुए थे और इनके पुरुषों की संख्या 18000 थी, ऐसा महाभारत के सभापर्व में लिखा है।

उस समय यादव संघ के राजा उग्रसेन थे। उग्रसेन के पिता का नाम आहुक और छोटे भाई का नाम देवक था। इसी देवक की पुत्री होने के कारण श्रीकृष्ण की माता को देवकी कहते हैं, उसका वास्तविक नाम कुछ अन्य ही था। यादवों में परस्पर फूट थी और उनके दो दल बने हुए थे। एक दल के नेता आहुक थे और दूसरे दल के नेता का नाम अक्रूर था। दोनों में भारी मतभेद होने के कारण बात-बात में लड़ाई होती रहती थी। यद्यपि यादव बड़े शक्तिशाली और विकट योद्धा थे परंतु उनकी पारस्परिक फूट का लाभ उठा कर मगधराज जरासंध ने उग्रसेन के पुत्र कंस को अपना दामाद बना लिया और उसके इशारे पर ही कंस ने अपने पिता, चाचा तथा उनके दामाद वसुदेव को नजर बंद कर लिया और स्वयं गद्दी पर बैठ गया। राज सिंहासन पर बैठने के साथ ही अर्थ के लिए उसने प्रजा का उत्पीड़न करना शुरू कर दिया। संत्रस्त जनता ऊपर से उसके साथ थी परंतु मन में उसके प्रति भारी विद्रोह था।

श्री कृष्ण के पिता वसुदेव को जब कंस ने नजर कैद किया उस समय उनकी एक अन्य पत्नी रोहिणी गर्भवती थी। वसुदेव ने उसे चुपचाप मथुरा से कुछ दूर देहात में अपने मित्र गोपालक नन्द के पास भेज दिया था। वहां श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ वे वही पल रहे थे। कंस वासुदेव की एक भी संतान को जीवित नहीं देखना चाहता था। क्योंकि उसी से उसके राज्य के लिए खतरा था। कारण कि राज्य के वही वारिस बनने के अधिकारी थे। अतः कंस देवकी की प्रत्येक संतान को पैदा होते ही मरवा देता था। वसुदेव ने किसी प्रकार प्रजाजनों के सहयोग से श्रीकृष्ण को जन्मते ही छिपा कर अपने मित्र नंद के घर पहुंचा दिया, वही उनका पालन पोषण हुआ इसलिए कृष्ण को नंदलाल कहते हैं। नंद की पत्नी यशोदा ने इन्हें पाला इसीलिए श्रीकृष्ण यशोदा नंदन कहे जाते हैं।

श्रीकृष्ण के बारे में कंस को तब पता चलता है, जब वे किशोरावस्था को प्राप्त हो कर, कंस के विरुद्ध कई अवज्ञापूर्ण कृत्य कर डालते हैं तथा अपने बल पौरुष के लिए जन साधारण में अति प्रसिद्ध और चर्चित हो जाते हैं। कंस एक योजना के अनुसार इन दोनों भाइयों को जान से मार देना चाहता था। वह एक दंगल लगवाता है और अपने दो प्रसिद्ध पहलवानों मुष्टिक और चाणूर से श्रीकृष्ण और बलराम का मल्लयुद्ध कराने हेतु निमंत्रण देता है। इसे दोनों भाई सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं। वे मथुरा आते हैं और दंगल में दोनों पहलवानों के साथ-साथ स्वयं राजा कंस का भी वध कर देते हैं। श्री कृष्ण कंस के शिर से राजमुकुट उतार अपने नाना उग्रसेन को पहना देते हैं और उन्हें पुनः यादों का राजा बना देते हैं। प्रजा तो कंस के अत्याचारों से तंग थी अतः उसने कोई विरोध नहीं किया परंतु श्री कृष्ण जरासंध के सबसे बड़े शत्रु के रूप में प्रकट होकर आ जाते हैं। यहीं से उनका कार्यक्षेत्र में अवतरण होता है।

जरासंध ने यादव कुल में फूट डालकर उनके संघ को तहस-नहस कर दिया था। अब  जरासंध से रक्षा के लिए संघ का पुनर्गठन आवश्यक था, साथ ही जरासंध के अत्याचार से भविष्य में भी छुटकारा पाना था । जरासंध उस समय का एक बड़ा शक्तिशाली सम्राट था । अतः श्रीकृष्ण ने उस से निपटने की योजना पर विचार किया। उनके समक्ष सारा भारत खंड-खंड हुआ बिखरा पड़ा था, अतः उन्होंने इस खंड-खंड हुए भारत को पुनः अखंड बनाने का व्रत लिया और एक सुंदर संकल्प के साथ अपना कार्य प्रारंभ किया।

क्रमशः

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