आर्य लेखक परिषद् देश के सभी राष्ट्रभक्त लेखको का आव्हान करती है ।

मांसाहार पर चोट।

धर्म और ईश्वर के नाम पर जानवर काटे और खाएं जायेंगे, क्या ईश्वर में दया नाम का गुण नहीं है, क्या कोई मनुष्य चाहेगा कि उसकी संतान को या परिवार के सदस्य को मारा जाए, ऐसे में भला उस परमेश्वर को क्रोध न आता होगा भला कि मेरे नाम पर कैसे पाखंड चल रहे हैं?

मांसाहार से प्रकृति का कितना नुक्सान है :
१. मांस को सड़ने से बचाने के लिए क्योंकि मांस जलती सड़ता है बड़े बड़े फ्रीजर का इस्तमाल होता है, जो प्रकृति का अनावश्यक नुकसान करते हैं।
२. मांस को साफ करने में ज्यादा पानी की बरबादी होती है।
३. मांस को पकाने में जितना ईंधन खर्च होता है उतना अन्य दाल सब्जी पकाने में नहीं होता।
४. मांसाहार से पाचनशक्ति कमजोर होती है, मांस को शरीर में 16 घंटे से ज्यादा समय लगता है, जबकि दाल सब्जी में 8 से 12 घंटे यानी शरीर को ज्यादा कष्ट होता है उसे पचाने में।
५. मनुष्य मांसाहार रोजाना नहीं कर सकता, पाचन खराब होने से बीमारीयां बड़ जाती है, शाकाहारी बिना व्रत किए भी रह सकता है।

वस्तुतः मनुष्य का शरीर मांसाहार के लिए नहीं है, मनुष्य के शरीर की अंतड़ियां लम्बी है जो मांस को सड़ाती है, मांसाहारी जानवर की अंतड़ियां छोटी होती है,

पर स्वाद के कारण और पाखंड के नाम पर निर्दोष जीवों को मारा जाता है और ऐसे लोगों को दया भी नहीं आती, भला क्या ऐसी सोच संसार को सुख दे सकती है, नहीं संसार को राक्षस जरूर बना सकती है, क्योंकि जो धर्म के नाम पर निर्दोष जानवरों को मार कर खा सकता है , कल वही धर्म के नाम पर आपको भी हानी पहुंचा सकता है।

सावधान मांसाहारी चाहे हिन्दू हो या मुस्लिम, सिख हो या ईसाई, मांसाहारी किसी का सगा नहीं होता, यह स्वार्थी और धूर्त होते हैं।

शाकाहार अपनायें।

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Comments

  1. मांसाहारी भोजन क्यों नही प्रयोग करें :-
    1. वध किए गए पशु/पक्षी की उस समय की मनोदशा व उपजे हार्मोन्स का इंसानों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
    2. जरा सोंचे व विचार करें कि परिवार मे किसी की मृत्यु के पश्चात व अंतिमक्रिया उपरांत घर की साफ सफाई द्वारा शुध्धिकरण करने के बाद ही भोजन पकाया जाता है जिससे नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो सके परंतु मनुष्य मुर्दे का मांश पकाकर आराम से भक्षण करता है।

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