ब्राह्मण वेद नहीं

– वेदप्रिय शास्त्री

महर्षि दयानंद मन्त्रसंहिताओं को ही वेद स्वीकार करते हैं। ब्राह्मण भाग की वेद संज्ञा स्वीकार नहीं करते। उनसे पूर्व और उनके समय के कतिपय विद्वान् मंत्र संहिताओं के साथ ब्राह्मण भाग को भी वेद नाम देने का आग्रह करते थे। इसके लिए वे प्रमाण रूप में एक सूत्र उपस्थित करते थे जिसे कात्यायनकृत कहते थे। सूत्र है ‘मंत्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्’।


यह सूत्र कात्यायनीय श्रौत सूत्र मे कहीं भी नहीं मिलता। कात्यायन के नाम से प्रसिद्ध ‘प्रतिज्ञा परिशिष्ट’ मे प्राप्त है। कात्यायन के नाम से दो प्रतिज्ञा परिशिष्ट मिलते हैं, एक श्रौतसूत्र से सम्बद्ध है और दूसरा प्रातिशाख्य से । ‘मंत्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्’’ सूत्र प्रातिशाख्य से सम्बद्ध प्रतिज्ञा परिशिष्ट में उपलब्ध होता है, श्रौतसूत्र में नहीं। अन्यत्र यह सूत्र कृष्णयजुर्वेदीय श्रौतसूत्रों के परिभाषा प्रकरण में सभी सूत्रकारों ने पढ़ा है । इस पारिभाषिक सूत्र के अतिरिक्त सम्पूर्ण वैदिक वाङ्मय में एक भी प्रमाण नहीं मिलता, जहाँ स्पष्ट रूप से ब्राह्मण की वेद संज्ञा कही गई हो। अपिच मात्र कृष्णयजुर्वेद से सम्बद्ध श्रौतसूत्रों के अतिरिक्त ऋग्वेद, शुक्लयजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेदादि से सम्बद्ध श्रौतसूत्रों में भी इसका उल्लेख नहीं है। इसका कारण जानना आवश्यक है। कृष्ण यजुर्वेदियों को ही इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी?

पारिभाषिक संज्ञाएँ तभी रची जाती हैं, जब वे लोक में प्रसिद्ध न हों अथवा अन्य शास्त्रों में अन्यार्थ में प्रसिद्ध हों। ये संज्ञाएँ उसी शास्त्र में स्वीकार की जाती हैं, जिसके लिए रखी गईं होती हैं । अन्यत्र स्वीकार नहीं होंगी। अत: ब्राह्मण की वेद संज्ञा केवल कृष्ण यजुर्वेदियों के श्रौत कर्मकांड में ही स्वीकार होगी, अन्यत्र कहीं नहीं। कात्यायन की यह संज्ञा प्रातिशाख्य तक सीमित रहेगी। अत: ब्राह्मण की वेद संज्ञा कृत्रिम है।

शब्द का अपरिभाषित अर्थ ही मुख्य होता है, परिभाषित अर्थ गौण होता है। ब्राह्मण की वेद संज्ञा परिभाषित होने से गौण और कृत्रिम हैं। अत: ब्राह्मण भाग वास्तव में वेद नहीं है। उक्त पारिभाषिक सूत्र की रचना से पूर्व केवल मन्त्र संहिता की ही वेद संज्ञा प्रसिद्ध थी। यदि ब्राह्मण की वेद संज्ञा प्रारंभ से ही होती तो सूत्र रचना की आवश्यकता ही न होती।

अतएव जहाँ कहीं किसी विद्वान् ने वेद शब्द से ब्राह्मण का उल्लेख किया है, वह उसके गौण और सीमित परिभाषित अर्थ में ही किया है। मुख्य अर्थ में नहीं।

स्वयं ब्राह्मण में जहाँ कहीं वेद शब्द आया है, वहां मन्त्र भाग का ही ग्रहण किया गया हई, उसी के लिए आया है।

आपस्तम्ब श्रौतसूत्र की व्याख्या में हरदत्त और उनके पूर्ववर्ती धूर्तस्वामी ने ‘मंत्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम‘ सूत्र की व्याख्या करते हुए लिखा है कि – कैश्चिन्मन्त्राणामेववेदत्वमाख्यातं अर्थात् ‘अनेक आचार्य केवल वेद मन्त्रों की ही वेद संज्ञा कहते हैं’। इन्हीं ‘कैश्चिन्’ में महर्षि दयानंद भी हैं। आचार्य शंकर स्वामी भी मन्त्र भाग का ही वेदत्व मानते हैं। वृहदारण्यकोपनिषद् जो कि शतपथ ब्राहमण का ही एक भाग है, की व्याख्या में एक स्थान पर लिखा है- ‘यदृग्वेदो, यजुर्वेद:, सामवेदोƧथर्वाङ्गिरसश्चतुर्विधं मन्त्रजातं’ वृ. २-४-१०

महर्षि दयानन्द ने अपने पक्ष की पुष्टि मे एक प्रमाण व्याकरण महाभाष्य से भी उद्धृत किया है, जो इस प्रकार है- अन्यच्च महाभाष्येƧपि-‘केषां शब्दानाम् ? लौकिकानां वैदिकानां च । तत्र लौकिकास्तावत्-गौरश्वः पुरुषो हस्ती शकुनिर्मृगो ब्राह्मण इति । वैदिकाः खल्वपि-शन्नो देवीरभिष्टये । इषे त्वोर्जे त्वा । अग्निमीळे पुरोहितम् । अग्न आ याहि वीतये इति ।।

इस पर वे लिखते हैं कि यदि महाभाष्यकार को ब्राह्मण की वेद संज्ञा अभीष्ट होती तो यहाँ वैदिक शब्दों मे ब्राह्मण का भी एक आध उदाहरण देते। परंतु ऐसा नहीं करने से यह सिद्ध है कि उन्हें ब्राह्मण की वेद संज्ञा मान्य नहीं थी। इत्यादि।

एक पौराणिक भद्र पुरुष ने इसका खंडन करने का असफल प्रयास किया है। उसने महाभाष्य के इसी पस्पशाह्निक से भाष्यकार का एक वचन उद्धृत किया है और यह सिद्ध किया है कि महाभाष्यकार ब्राह्मण को वेद मानता है। यथा- वेदे खल्वपि – ‘पयोव्रतो ब्राह्मण: यवागूव्रतो राजन्यः आमिक्षाव्रतो वैश्यः’ इत्युच्यते |

निश्चित ही यह वाक्य ब्राह्मण ग्रंथ का है। परंतु इससे यह कदापि सिद्ध नहीं होता कि ब्राह्मण की वेद संज्ञा है। हमें लगता है कि ये भद्र पुरुष या तो अज्ञ हैं, या दिवान्ध है या छली है। इन्होने प्रकरण पर बिना विचारे ही कुछ का कुछ लिख मारा है।


देखिये, यहाँ प्रकरण क्या है? प्रकरण है कि शास्त्र क्या करता है? उत्तर है: – “लोकतः अर्थप्रयुक्ते शब्दप्रयोगे शास्त्रेण धर्मनियमः क्रियते”। अर्थात् लौकिक और वैदिक शब्दों के प्रयोग मे शास्त्र धर्म नियम करता है। आगे लौकिक शब्द देकर वहाँ किया गया नियम बताते हैं।
एक शब्द है- ‘भक्ष्यं’. इसका अर्थ है-भूख मिटाने का पदार्थ। इसपर कहते हैं कि भूख तो कुत्ते के मांस से भी मिट जाएगी, इसलिए शास्त्र ने नियम किया कि यह भक्ष्य है और यह अभक्ष्य है।
इसी प्रकार एक शब्द है ‘खेद’। इसका अर्थ है पुरुष की स्त्रियॉं मे प्रवृत्ति । इसपर कहते हैं की खेद विगम अर्थात पुरुष की काम तृप्ति तो गम्य और अगम्य दोनों मे ही हो जाती है, सो कहीं भी कर लेगा। कहते हैं कि इस पर शास्त्र नियम करता है कि यह गम्य है, यह अगम्य है।
इस प्रकार लोक से ज्ञात अर्थवाले शब्द पर शास्त्र धर्म नियम करता है।

अब आगे वेद के शब्दों पर किए गए शास्त्र नियम का उदाहरण देते हैं।
वेद का एक शब्द है ‘व्रत’। कहते हैं ‘व्रतम् च नाम अभ्यवहारार्थम् उपादीयते।’ अर्थात व्रत मे कुछ ग्रहणीय आहार लेना, सो शालि मांसादि से भी हो सकता है। कहते हैं- नहीं! वहाँ शास्त्र नियम करता है- ‘पयोव्रतः ब्राह्मणः यवागूव्रतः राजन्यः…’ इत्यादि।

दूसरा शब्द है ‘यूप’। यह वेद का शब्द है। इसका अर्थ है पशु को बांधने के लिए उपयुक्त खूंटा। कहते हैं- किसी भी काष्ठ से यह कार्य हो सकता है, चाहे छीलकर बनावे, चाहे बिना चीले बनाले, पशु तो बंध ही जाएगा। कहते हैं- नहीं! यहाँ शास्त्र नियम करता है- ‘बैल्वः खादिरः वा यूपः स्यात्…’। बिल्व या खदिर का ही यूप होना चाहिए।

तीसरा शब्द है- ‘कपाल’ । अग्नि पर कपाल रखकर अभिमंत्रण करे- ‘भृगूणाम् अङ्गिरसाम् घर्मस्य तपसा तप्यध्वम्’ इस मंत्र से। इसपर कहा कि मंत्र के बिना भी कपाल को अग्नि गरम कर देता है, फिर मंत्र क्यों पढे? तो कहते हैं कि शास्त्र ने नियम किया है कि मंत्र पढ़कर ही कपाल रखे। ऐसा शास्त्र नियमानुसार करने से क्या होगा? इसपर कहते हैं कि ऐसा किया हुआ अभ्युदयकारी होता है।

उक्त प्रकरण मे लौकिक शब्दों पर धर्म शास्त्र नियम करता है और वैदिक शब्दों पर ब्राह्मण नियम करता है। यहाँ यही प्रयोजन है। इसलिए वेदे खलु अपि से तात्पर्य वेद के शब्दों से हैं, ब्राह्मण को वेद मानने से नहीं। अन्यत्र भी इसी आशय से ब्राह्मण पाठ प्रयुक्त किए गए हैं।

परंतु शास्त्र को समझने की योग्यता और सूक्षग्राही पवित्र बुद्धि चाहिए, जो उक्त भद्र पुरुष और उनके सहयोगियों मे नहीं है। इनकी विद्वत्ता श्वपुच्छवत् है- न गुह्य गोपनेसक्ता न च दंश निवारणे।

भगवान पतंजलि चरक चरणान्तर्गत काठक शाखा के अध्येता थे। काठक शाखा कृष्णयजुर्वेद से सम्बद्ध कही जाती है। अत: पतंजलि मुनि ‘मंत्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्’ से भी अवश्य परिचित होंगे। परंतु वे उसकी गौणता समझते होंगे। तभी उन्होने लिखा है- ‘न लक्षणेन पदकाराअनुवर्त्या: पदकारै: नामलक्षणमनुवर्तनं॥’
इसकी व्याख्या मे कैयट लिखते हैं- ‘न लक्षणेनेति। संहिताया: एव नित्यत्वं। पदविच्छेदस्य तु पौरुषेयत्वं। महाभाष्य-३-१-१०९
पतंजलि कहते हैं- न हि छन्दांसि क्रियन्ते नित्यानि छन्दांसि इति यदि अपि अर्थः नित्यः या तु असौ वर्णानुपूर्वी स अनित्या तद्भेदात् च एतत् भवति काठकम् कालापकम् —इत्यादि. महाभाष्य-४-३-१०४
अर्थात् छंद (मंत्र) किए नहीं जाते, वे नित्य हैं। शाखाओं का अर्थ तो नित्य है परंतु उनकी वर्णानुपूर्वी अनित्य है।

इस प्रकार पतंजलि मुनि शाखाओं को पौरुषेय, अनित्य और परत: प्रमाण मानते हैं। इसी प्रकार ब्राह्मण भी पौरुषेय, अनित्य और परत: प्रमाण ही है। महर्षि जैमिनी भी मंत्र संहिता को ही वेद संज्ञा स्वीकार करते हैं। वेद और ब्राह्मण के मिश्रण को ‘आम्नाय’ संज्ञा प्रदान की है। मीमांसा दर्शन के वेदापौरुषेयाधिकरण मे मंत्र संहिताओं को ही वेद नाम से कहा गया है।

शतपथ ब्राह्मण के भाष्यकार हरिस्वमी भाष्य की भूमिका मे लिखते हैं, – वेदस्यापौरुषेयत्वेन स्वत:प्रामाण्योसिद्धं तच्छाखानामपि तद् हेतुत्वात् प्रामाण्यं बादरायणादिभि: प्रतिपादितं । 
अर्थात् ‘वेद के अपौरुषेय होने से, स्वत: प्रमाण सिद्ध होने से शाखाओं का भी प्रमाण व्यासादि ने कह दिया है। अत: शाखाओं से पृथक जो मंत्र संहिता है वही स्वत: प्रमाण है, शाखाएँ तदनुकूल होने से ही प्रमाण होंगी। स्पष्ट ही शाखाएँ और ब्राह्मण मनुष्यप्रोक्त हैं। फलत: वे अपौरुषेय, नित्य और स्वत: प्रमाण कदापि नहीं हो सकते।

इसलिए ब्राह्मण की वेद संज्ञा अमान्य है।

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