गर्व योग्य नाम (भाग १)

संसार में नाम का बड़ा महत्व है। भगवान ने सृष्टि रचकर सभी पदार्थों को नाम दिये हैं, जो उनके गुण धर्मों के अनुसार सार्थक और व्यहार्य हैं। वैदिकों में तो नामकरण एक संस्कार के रूप में ही स्वीकार किया गया है। जिसमें नए उत्पन्न प्रत्येक बालक को सुन्दर सार्थक नाम देने का विधान है। नाम का नामी के साथ सम्बन्ध होता है और उसका उच्चारण करके सम्बोधन करने पर वह नामी के साथ अन्यों को भी प्रभावित और प्रेरित करता है। अच्छा नाम नामी को मनोवैज्ञानिक ढंग से अच्छा बनाने के लिए उत्साहित करता रहता है। इससे व्यक्ति के माता-पिता की योग्यता और विचारों का भी परिचय प्राप्त होता है। बहुत से माँ–बाप अपने बच्चों के उलटे-पुल्टे कुत्सित अर्थयुक्त नाम रख दिया करते हैं जो सुनने में और अर्थ ग्रहण में बहुत बुरे लगते हैं। यही कारण है कि बहुत से लोग बड़े होकर अपने माँ- बाप द्वारा दिये गये नाम को छोड़कर अन्य उत्तम नाम ग्रहण करते हैं और समाचार पत्र में उसकी घोषणा करते हैं।

भगवान ने सृष्टि के आदि में मनुष्यों को दो प्रकार के नाम दिये । जो धर्मात्मा, उत्तम चरित्र, सत्यवक्ता और न्यायप्रिय आस्तिक लोग थे, उन्हें आर्य नाम दिया और इनसे विपरीत गुण वालों को दस्यु नाम दिया । वेदों में परमात्मा का उपदेश है कि – ‘अहं भूमिम् अददामार्याय’ अर्थात्  मैं यह भूमि आर्य चरित्र के लिए प्रदान करता हूँ, दस्यु के लिए नहीं । अतः ‘विजानीहि आर्यान् ये च दस्यव’ आर्यों और दस्युओं की पहचान करो और जो व्रतहीन दस्यु हैं, उन्हें शासित और दण्डित करो, इसी में सबका कल्याण निहित है । सारे संसार में आर्यत्व का प्रचार करो और सबको आर्य बनाने के लिए यत्नशील रहो ।

इसी आधार पर आदि सृष्टि में उत्पन्न हमारे पूर्वजों ने अपने को आर्य नाम से अलंकृत किया और एक कौम के रूप में भी अपने को आर्य कहा तथा समाज को आर्य समाज नाम दिया। उन्होंने ही इस देश को बसाया और इसका नाम “आर्यावर्त” रखा । कालान्तर में यहीं से चलकर लोग शनैः-शनैः सारी धरती में फैल गये । कुछ लोग आर्य आचार – विचार को साथ ले गये और जहाँ गए, वहाँ भी उसे अपनाए रहें । परन्तु अनेक लोग पतित होकर दस्यु भाव से युक्त होकर बाहर हो गये । वे लोग आर्य धर्म और आचार का परित्याग करने वाले तथा आर्यों से शत्रुता रखने वाले हो गये । सृष्टि के आदि में ब्रह्मा का मानस पुत्र स्वयंभुव मनु सर्व प्रथम आर्य राजा हुआ । उसके प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो पुत्र हुए । प्रियव्रत का विवाह कर्दम प्रजापति की पुत्री प्रजावती के साथ हुआ । इसके दस पुत्र और दो कन्याएं हुई । राजा प्रियव्रत ने सारी पृथ्वी को सात भागों में बांट कर अपने सात पुत्रों को एक-एक भाग का राजा बना दिया, तीन पुत्र विरक्त हुए ।

यह आदि काल भारतीय इतिहास में पितृयुग नाम से विख्यात है । उक्त सात भू भाग- जम्बूद्वीप, लक्ष्यद्वीप, शाल्मलिद्वीप, कुश द्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप, और पुष्कर नाम से प्रसिद्ध हुए । जम्बुद्वीप का राजा ‘आग्नीध्र’ हुआ उसके नौ पुत्र हुए ।उसने जम्बुद्वीप को नौ भागों में बाँटा । जेष्ठ पुत्र का नाम ‘नाभि:’ था । नाभि के ऋषभ नामक पुत्र हुआ और ऋषभ के प्रतापी भरत नामक पुत्र हुआ । इसी भरत को जो भूभाग प्राप्त हुआ उसे भरत या भारतवर्ष कहा गया । इस प्रकार ‘आर्यावर्त’ का एक नाम ‘भारत’ भी हो गया।

आगे चलकर दक्ष प्रजापति की पुत्री अदिति से मारीच कश्यप के बारह पुत्र हुए जो आदित्य कहलाए । इन्हीं में से विवस्वान् नामक पुत्र से मनु व यम वैवस्वत दो पुत्र हुए । ‘मनु’ भारतवर्ष के राजा हुए और ‘यम’ पारस (ईरान) के राजा हुए । इसलिए पारसी धर्मग्रन्थ वेदों से मिलता जुलता है और पारसी आचार भी आर्यों जैसा ही था । अधिक जानकारी के लिए पाठक देखें- (‘भारतवर्ष का वृहद् इतिहास’ लेखक पंडित भगवत्दत्त रिसर्चस्कॉलर )

इस प्रकार वेद वर्णित गुणवाची, आर्यशब्द व्यक्तिवाची और जातिवाची होकर हमारा और हमारी कौम का गौरव पूर्ण नाम बन गया । लाखों वर्ष तक संसार में आर्यों का चक्रवर्ती साम्राज्य रहा और यहाँ के राजे अपनी धर्म परायणता, सत्यवादिता और न्याय प्रियता के कारण दीर्घ कल तक सारे संसार के श्रद्धापात्र नेता बने रहे । वैदिक धर्म सबके लिए आदरणीय रहा । परन्तु कालान्तर में दुर्भाग्य, आलस्य और प्रमाद के कारण यहाँ के राजे धर्महीन, असत्य, अन्याय और चरित्रहीनता का आचरण करने लगे । विलासिता और व्यभिचार में रत रहने लगे । प्रजा का उत्पीड़न करने लगे ।अपने अधर्म और अन्याय को धर्म का रूप देने लगे । इस कार्य में स्वार्थी ब्राह्मणों ने उनकी साहयता की, साथ ही दुष्ट धनिकों ने भी सहयोग किया। परिणाम स्वरूप एक वैदिक धर्म के स्थान पर मानव सुलभ दुर्बलताओं पर आधारित नाना मतमतान्तरों का प्रादुर्भाव हो गया । एक आर्य समाज नाना वर्गो और उपवर्गो में विभक्त हो गया । संगठन विघटन में बदल गया । राजाओं में परस्पर फूट होकर कलह उत्पन्न हो गई । वे परस्पर लड़ने लगे । इधर प्रजा का धार्मिक और राजनैतिक उत्पीड़न बढ़ता चला गया । सर्वत्र अत्याचार, अन्याय और शोषण का बोलबाला हो गया । इसका लाभ उठाकर आसुरी शक्तियों  ने इस देश पर आक्रमण कर दिया । यहाँ का सारा धन माल लूट कर ले गए, बहन- बेटियों की अस्मत लूटी, पूजा स्थान तोड़े और लोगो को पकड़ कर दो -दो  रुपये में गुलाम बनाकर बेचा। इसके पश्चात हमारी कौम को और हमें आर्य के स्थान पर हिन्दू नाम दिया । इसे ही हम अब तक लादे हुए हैं। ‘हिन्दू शब्द वेदों, ब्राह्मण ग्रंथो, आरयण्कों, उपनिषदों, शिक्षा, व्याकरण, कल्प, ज्योतिष, छंद और  निरुक्त नामक वेदांगो, न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व मीमांसा और वेदांत दर्शनों, रामायण, महाभारत आदि इतिहासग्रंथो में, ब्रह्म वैवर्त्तादिअठारह पुराणों, जैन ग्रंथो व बौद्ध ग्रंथो में कहीं नहीं मिलता है|मनुस्मृति आदि स्मृति ग्रंथो में भी नहीं पाया जाता । अमर कोषादि शब्द कोषों में भी उपलब्ध नहीं है| रघुवंशादी संस्कृत काव्य ग्रंथों तथा शाकुन्तल आदि नाटकों में भी इसका प्रयोग नहीं प्राप्त होता । यही नहीं समय समय पर होने वाले मत प्रवर्तक आचार्यों यथा शंकर, रामानुज, मध्वाचार्य, वल्लभाचार्य और निम्बार्काचार्यदि ने भी अपने ग्रंथों में “हिन्दू” शब्द का कहीं उल्लेख नहीं किया । वेदभाष्यकार, सायणाचार्य ने भी कहीं इसका प्रयोग नहीं किया । मुसलमानों के इस देश में आने से पूर्व के किसी भी ग्रन्थ में यह शब्द नहीं मिलता ।(देखें – हमारा नाम आर्य है । लेखक – वेदानन्द तीर्थ)

ईस्वी  671 में एक चीनी यात्री जिसका नाम इत्सिंग था, भारत आया था, उसने लिखा है कि हिन्दू (हिंस-तू) शब्द का प्रयोग केवल उत्तर की जातियाँ अर्थात् तातारी (तुर्किस्तानी) और अफगान लोग ही करते थे परन्तु भारत के लोग इस शब्द से बिलकुल अपरिचित थे। यह चीनी यात्री लगभग 18 अट्ठारह वर्ष तक भारत में रहा। इसके यात्रा वृतान्त का अंग्रेजी अनुवाद डॉ॰ तकाकुसु ने किया और श्री संतराम जी ने हिंदी में अनुवाद किया है ।

संवत् 1927 वि.के श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को काशी की पण्डित मण्डली के समक्ष काशी नरेश की धर्मसभा में यह शब्द विचार के लिए रखा गया था। इस पर 46 पण्डितों ने सर्व सम्मत रूप से यह व्यवस्था दी थी। यह शब्द हमारी संस्कृति और हमारे देश का नहीं है । यह सभा ईसवी सन् 1870 में काशी के टेढ़ा नीम नामक स्थान पर हुई थी । इस पण्डित मण्डली में काशी के प्रसिद्ध विद्वान् स्वामी विशुद्धानन्द और श्री बालशास्त्री भी सम्मिलित थे, जिनके साथ स्वामी दयानन्द सरस्वती का वेदों में मूर्ति पूजा विषय पर शास्त्रार्थ हुआ था ।

पण्डितों के व्यवस्था पत्र में लिखा है कि – ‘हिन्दू’ शब्द की चर्चा किसी शास्त्र में नहीं मिलती, वर्णाश्रमी देश बोधक जो हिन्दू शब्द है सो यवन – संकेतित है । इस कारण हिन्दू कहावना सर्वथा अनुचित है ।

हस्ताक्षर (1) श्री विश्वनाथ शर्मा (2) श्री बाबा शास्त्री ।

इस व्यवस्था पत्र के अन्त में पण्डितों ने हस्ताक्षर किए । सब के अन्त में पण्डित दुर्गादत्त ने हस्ताक्षर किए और यह श्लोक लिखा – हिन्दू शब्दो हि यवनेष्वधर्मि जन बोधक: । अतो नार्हन्ति तच्छब्द बोध्यतां सकला जनाः । अर्थात् ‘हिन्दू’ शब्द यवनों के यहाँ अधर्मी जन के लिए प्रयुक्त होता है | अतः सब लोगों को इस नाम से पुकारना उचित नहीं है । (देखें ‘विचार वाटिका द्वितीय खण्ड पृ॰ 137 ले. स्वा. श्रद्धानन्द)

अपिच –   पापिनां   पापी  यवनः  संकेतं  कृत्वान्नरः |
         नोचितः स्वीकृतोऽस्माभिर्हिन्दु शब्द इतीरितः ||
        काफिर को हिन्दू कहत, यवन स्वभाषा मांहि |
        ताते हिन्दू  नाम यह  उचित  कहइबो नांहि ||

‘मुसलमानी अमल के पहले कोई भी भारतवासी ‘हिन्दू’ कहकर अपना परिचय नहीं देता था, इसी से किसी प्राचीन संस्कृत या प्राकृत भाषा के ग्रन्थ में हिन्दू शब्द का उल्लेख नहीं है’ (देखें- ‘हिन्दी विश्वकोष’ में हिन्दू शब्द पर टिप्पणी) ईसा की उन्नीसवी शताब्दी में भारत के प्रसिद्ध सन्यासी स्वामी दयानन्द सरस्वती ने 10 जुलाई सन् 1875 ई॰ को पूना में प्रवचन करते हुये कहा था कि ‘ हिन्दू शब्द का उच्चारण मैंने भूल से किया । ‘हिन्दू अर्थात् काला काफिर, चोर आदि । यह नाम हमें मुसलमानों ने दिया । तो मैंने मूर्खता से उस शब्द को स्वीकार किया था । ‘आर्य’ अर्थात् श्रेष्ठ यह हमारा नाम है।

पुनः 24 जुलाई 1875 ई॰ को दिये प्रवचन में कहा – “अपने देश का नाम ‘आर्यावर्त’ और हमारा नाम आर्य है । सो उसे छोड़ यह हिन्दुस्तान नाम न जाने कहाँ से निकला । भाई श्रोतागण ! हिन्दू शब्द का अर्थ काला, काफिर, चोर आदि है और – ‘हिन्दुस्तान’ कहने से काले, काफिर, चोर आदि लोगों की जगह अथवा देश ऐसा अर्थ होता है । भाई ! इस प्रकार का बुरा नाम क्यों ग्रहण करते हो और आर्य अर्थात् श्रेष्ठ अथवा अभिजात इत्यादि और आर्यावर्त कहने से ऐसों का देश – ऐसा अर्थ होता है । सो भाई ऐसा श्रेष्ठ नाम का तुम ग्रहण क्यों नहीं करते? क्या तुम अपना नाम भी भूल गये । हाँँ ! हम लोगों की यह स्थिति देखकर किसके ह्रदय को क्लेश न होगा । अस्तु ! सज्जन जन ! आज से हिन्दू नाम का त्याग करो और आर्य तथा आर्यावर्त इन नामों का अभिमान धरो । गुण भ्रष्ट हम लोग हुए, तो हुए परन्तु नाम भ्रष्ट तो हमें न होना चाहिए । ऐसी आप सबों से मेरी प्रार्थना है ।”

परन्तु दुर्भाग्य से इस देश के पाखण्डी और शोषक पुरोहित वर्ग तथा गद्दार विलासी, प्रजा पीड़क तथा शोषक राजन्य वर्ग ने इस उक्त प्रार्थना की उपेक्षा जानबूझ कर की । ये वे लोग थे जिन्होंने अंग्रेजी सरकार से वफादारी के बदले बड़े–बड़े तमगे और रुतबे हासिल किये थे, जागीरें और जामींदरिया प्राप्त की थीं । वे लोग थे जिनमें नस्ली अहंकार या मिथ्या जात्याभिमान भरा हुआ था, जो अपने को कुलीन, उच्च और पवित्र समझते थे । ये वे लोग थे जो ऊँच-नीच और छुआछूत करने वाले थे और इसी आधार पर कौम के लाखों लोगों को उनके मूलभूत अधिकारों तक से वंचित कर रखा था । इन्हीं लोगों ने अंग्रेज से मिलकर स्वामी दयानन्द की जान ले ली । ये लोग इतने से सन्तुष्ट नहीं हुए । स्वामी दयानन्द द्वारा स्थापित आर्य समाज को समाप्त करने के लिए इन लोगों ने समानान्तर संगठन खड़ा किया । आर्य समाज के स्थान पर हिन्दू कहलाना पसन्द किया और इसी की वकालत करने लगे । स्वामी दयानन्द के सामानांतर विवेकानन्द को लाकर खड़ा कर किया । इन सब के पीछे उद्देश्य यही था की “आर्य समाज” की हर मान्यता का विरोध किया जावे और पाखण्ड को विज्ञान सिद्ध किया जावे और इसी पुरानी शोषण पर आधारित कर्म काण्डीय व शासन व्यवस्था को प्रतिष्ठित किया जावें । तात्पर्य यह है कि पुरानी विषैली दावा नए लेबल के साथ अमृत बताकर प्रस्तुत करें ।वास्तव में ये वही दस्यु लोग हैं, जिन्होंने इस देश को अपनी काली करतूतों से गुलाम बनवाया था । इन लोगों का नारा है – “गर्व से कहो हम हिन्दू हैं”। इन लोगों ने ‘हिन्दू’ शब्द को स्वदेशी और स्वशासत्र सम्मत सिद्ध करने में एड़ी – चोटी का जोर लगाया, उलटे – सीधे लेख लिखे, परन्तु हरबार मुँह की खानी पड़ी । इस पर भी इन्हें तनिक भी लज्जा नहीं आती ।कारण यह है कि हिन्दू रह कर ही इनका मिथ्या जात्याभिमान सुरक्षित रहता है । देवी – देवता  के मंदिर जो शोषण के केंद्र हैं, वे बने रहेंगे, ज्योतिष का झूठा व्यापर चलता रहेगा, तीर्थो कि लूट बरकरार रहेगी, चमत्कार व ढोंग बने  रहेंगे । दो नम्बर का धर्म और दो नम्बर के भगवान बने रहेंगे । भाग्यवाद बना रहेगा । आर्य बनते ही लूट के सभी रस्ते बंद हो जाते हैं । सदियों से जिनके मुँह में  कौम के बहुसंख्यक किसान – मजदूर वर्ग का खून लग चूका है, जो हराम की बिना मेहनत की खाने के आदि हो चुके हैं, वे अपने आप को आर्य कैसे कह सकतें हैं ? इसलिए यह जानकर भी कि ‘हिन्दू’ शब्द विदेशियों द्वारा दिया गया सम्बोधन है और इसका अर्थ चोर, उच्चका, गुलाम, काला, और काफिर है, ये लोग इस पर गर्व करने कि बात कहते हैं । जिसे थोड़ा भी स्वाभिमान होगा वह ऐसा कदापि नहीं कह सकता । वास्तव में अपने को हिन्दू मानना और कहलवाना गर्व कि नहीं लज्जा कि बात है ।

         मुझे एक दृष्टान्त याद आ रहा रहा है – किसी गाँव में एक पटवारी रहता था जो थोड़ी बहुत अंग्रेजी जानता था । गाँव के बाकि लोग अनपढ़ थे । उस गाँव में कहीं से कोई अंग्रेज आ गया, उसने गाँव वालों से अंग्रेजी में बात की परन्तु गाँव वाले कुछ भी न समझ सके तब उन्होंने पटवारी जी से कहा की आप ही इस से बात करें । पटवारी उलटी सीधी अंग्रेजी बोला तो अंग्रेज को कुछ समझ नहीं आया । वह झल्लाकर पटवारी को डैम्फूल कह कर चला गया । उसके जाने के बाद पटवारी ने अपना रोब झाड़ते हुए कहा कि देखो अंग्रेज बहादुर मेरी बातों से खुश हो कर मुझे डैम्फूल का ख़िताब दे गया है अतः आज से आप लोग मुझे “डैम्फूल पटवारी” कहा करें । तब से गाँव वाले उसे डैम्फूल पटवारी के नाम से पुकारने लगे । बहुत दिनों बाद उस पटवारी का लड़का शहर से पढ़ कर गाँव आया, वह अंग्रेजी पढ़ा हुआ था । जैसे ही वह गाँव की सीमा में घुसा, लोगों ने कहा- डैम्फूल पटवारी जी का लड़का आया है । लड़के ने घर आकर अपने पिताजी से पूछा कि गाँव वाले आपको डैम्फूल क्यों कहते हैं? पटवारी ने कहा एक अंग्रेज मुझे यह ख़िताब दे गया था । लड़के ने कहा इसका मतलब तो बेवकूफ होता है । पटवारी ने कहा चुप रहो, नहीं तो गाँव वाले मुझे मूर्ख कहेंगे । इसी नाम को चलने दो । लड़के ने बहुत समझाया परन्तु पटवारी जी उसे छोड़ने कि तैयार नहीं हो सके । बस समझ लो कि यही हाल ‘हिन्दू’ शब्द पर गर्व करने वालों का है ।

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