उस रोगी को कौन बचाए, दवा समझता जो विष को

दुराचार उपदेश बने, व्यभिचार मुक्ति का द्वार हुआ।
कविता बनी चरित्र हीनता, योगी सब संसार हुआ।
जीव अधिकतर ब्रह्म हुए कामी कुत्ते भगवान बने।
अश्लीलता संस्कृति बन गई और धूर्त विद्वान् बने।
घोर अविद्या के पुतले शंकराचार्य कहलाते हैं।
राग- द्वेष से पूर्ण, स्वयं को वीतराग बतलाते हैं।
यम और नियम उदास खड़े हैं, योगासन अब खेल हो गए।
महर्षियों की नई शोध में,आज पतंजलि फेल हो गए।
स्वास्थ्य शिथिल है संयम जी का, वेद शास्त्र सब रोते हैं।
स्वयं पुण्य जी पाप कुण्ड में पड़े खा रहे गोते हैं।
बाजीगर सद्गुरु कहलाते, बगुले बन गए ब्रह्मज्ञानी।
पाखण्डी पण्डित बन बैठे, धर्म बन गई मनमानी।
श्वानवृत्ति ही राजनीति है और भेड़िए नेता हैं।
बन्दर वितरक बन बैठे हैं, तस्कर धर्म प्रणेता हैं।
प्रगतिशीलता यहां उड़ाती पुरखों की खिल्ली देखो।
अरे दूध की रखवाली में बैठी है बिल्ली देखो।
आज विश्व का गुरु यह भारत, दीन- हीन हो रोता है।
चोर यहां कोतवाल को डांटे,अजब तमाशा होता है।
सत्य,झूठ के द्वार खड़ा गिड़गिड़ा रहा है कर जोड़े।
वेदप्प्रिय,जिसको समझाए, वह ही उससे मुख मोड़े।
नहीं समझ में कुछ आता, किस तरह बचाएंअब किसको।
उस रोगी को कौन बचाए, दवा समझता जो विष को।।

– वेदप्रिय शास्त्री

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