आर्य लेखक परिषद् देश के सभी राष्ट्रभक्त लेखको का आव्हान करती है ।

उद्देश्य एवं कार्य

ईसा की 19वीं शताब्दी विश्व भर में एक परिवर्तन,आन्दोलन और क्रान्तियों की शताब्दी के रूप में जानी जाती है। यह वह समय था जब सर्वत्र पराधीनता की पीड़ा से लोग त्रस्त हो चुके थे और उसके विरुद्ध कुछ कर गुजरने के लिए सोचने लगे थे। विभिन्न देशों में अनेक क्रान्ति वीरों के नेतृत्व में युवा शक्ति अगड़ाई लेकर उठ खड़ी हुई थी। साम्राज्यवादी शोषक शक्तियों के विरोध में जान की बाजी लगाकर जूझने, सग्राम करने के लिए समुद्यत हो चुकी थी। लोग पराधीनता के जुए को उतार फेंकने का सुदृढ़ संकल्प कर चुके थे। परिणाम स्वरूप सर्वत्र विप्लव और विद्रोह फूट पड़ा। जिससे भविष्य में चलकर अच्छे परिणाम निकले और अनेक देश के शोषित, दलित, पराधीन लोगों को स्वतंत्र वातावरण में सांस लेने का अवसर मिला।

हमारा भारत देश भी पराधीन था। यहाँ पर भी कुछ स्वाभिमानी वीर पुरुष क्रान्ति करने को समुद्यत हो चुके थे। अनेक छिट-फुट विद्रोह भी हो रहे थे। परन्तु सफलता नहीं मिल रही थी। तभी ईश्वर की कृपा और आर्यों के सौभाग्य से एक महापुरुष का उदय हुआ और एक नई क्रान्ति का सूत्रपात हुआ। ये महापुरुष थे महर्षि दयानन्द सरस्वतीइनके द्वारा की जाने वाली क्रान्ति थी वैचारिक क्रान्ति-समग्र क्रान्ति। इनके द्वारा मिलने वाले परिणाम इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अधिकांश क्रान्ति वीर इसी विचार क्रान्ति की देन थे और अन्य इन्हीं से प्रेरणा लेकर राष्ट्र के लिए जीवन समर्पित करने वाले बने थे। देश तो स्वतंत्र हो गया परन्तु यह क्रान्ति अधूरी ही रह गई। इसे पूर्णता की ओर ले जाना शेष ही है।

विश्व की समस्त क्रान्तियों को अग्रसर करने और सम्पन्न करने में साहित्य लेखन का ही योगदान हुआ करता है। दबे,कुचले,भयभीत और साधनहीन जनों के मनों से हीन भावना,भय और कायरता निकालकर उनमें स्वाभिमान,निर्भयता,वीरता और बलिदान का भाव जागृत करने का दुष्कर कार्य लेखन द्वारा ही प्रचारित-प्रसारित हो पाता है।ऐसी योग्यता वाले लेखक ही लोक नायक और जनसामान्य के लिए प्रेरणास्रोत होते हैं। इन्हीं की पुस्तकें,लेख और जीवनियाँ पढ़कर क्रान्तिकारियों को मौत में मुस्कराने का जज़्बा आता है।

महर्षि दयानन्द द्वारा प्रवर्तित वैचारिक क्रान्ति में उनके द्वारा लिखित साहित्य का योगदान सबको विदित है। उनके पश्चात उनके आन्दोलन से जुड़े और उसे आगे बढ़ाने में जुटे अनेक वीर पुरुषों ने प्रभावी लेखन द्वारा अदभुत सफलता एवं स्वतंत्रता प्राप्त की। साथ में शत्रुओं की प्रताड़ना और दुर्वचनों को सहते हुए जान भी गँवा दी। सब दुख सहते हुए भी लेखन कार्य बंद नहीं किया और मरते समय भी लेखन कार्य जारी रखने की वसीयत और सन्देश दिये।

आर्यों के ऊपर उनका बहुत बड़ा ऋण है, जिसे चुकाना होगा। लेखन से तात्पर्य मन बहलाव करने वाले चुटकुले,रसदार कहानियों से नहीं होता। हँसी-मज़ाक और कामुकता बढ़ाने वाला लेखन कोई लेखन नहीं होता। इससे तो समाज का पतन और मानवीय-मूल्यों का हास्र ही होता है। जो लेखन मनुष्य की शून्य चेतना को जगाकर उसका आलस्य,प्रमाद दूर करके पुरुषार्थी बनाकर क्रान्ति को सम्पूर्णता की ओर ले जाने के लिए प्रेरित और बाध्य न कर सके ऐसा लेखन व्यर्थ ही माना जाएगा।

वर्तमान आर्य लेखन प्रभाव शून्य है। वह क्रान्ति का सम्पूरक न होकर पलायन की ओर ले जाने वाला है। लेखन,प्रवचन,व्यवसाय बन गए है। लेखक और प्रवक्ता क्रान्तिकारी न होकर व्यापारी बन गये है। कवियों के गीत,भजन व कविता सभी बन बहलाव के साधन बन चुके हैं। उनमें मानव मन को परिवर्तित करने का सामर्थ्य नहीं रहा। अनुसंधान और शोध कार्य,मौलिक सोच और खोजी श्रम से शून्य पिष्ट-पेषण,पुनरुक्ति व व्यर्थ की चर्चा से भरे हुए हैं। युवा पीढ़ी को आकर्षित करने,उसे ऊँचे चरित्र और ईमानदार व्यक्तित्व वाली बनाने की क्षमता वर्तमान लेखन में नहीं रही। उक्त वैचारिक क्रान्ति से परिचय कराने वाले साहित्य का अभाव ही हो गया है। बुद्धि के प्रत्येक स्तर के योग्य साहित्य वर्तमान में नगण्य-सा है। कुल मिलाकर आर्य लेखन के क्षेत्र में एक जड़ता और उद्देश्यहीनता व्याप्त है। कूपमण्डूप और तेली के बैल जैसी स्थिति है।

देश के अखबारों,आर्येत्तर पत्र-पत्रिकाओं में हमारे लेखन की कोई गति नहीं है और हमारी पत्रिकाओं का स्तर उन्हें सम्मान से वंचित रखता है। इसका कारण है हमारे लेखन को प्रोत्साहन देने, लेखकों और पत्रकारों को तैयार करने की कोई योजना नहीं है। कोई कुछ लिखता भी है तो कई पुराने खलीफा अखाड़ची लोग उससे ईर्ष्या,द्वेष करते हैं। और किचिंत त्रुटि मिलने पर उसे अज्ञ,स्वाध्याय शून्य और न जाने क्या-क्या लताड़ लगाते रहते हैं।

लेखक और पत्रकार माँ के पेट से ही बनकर नहीं आते हैं। यहीं बनाये जाते हैं। हमारे धुरन्धर क्या अपने पीछे कोई अपना स्थान लेने वाला व्यक्ति गढ़ने में रुचि रखते हैं अथवा उनके बाद उनका स्थान खाली ही रहेगा। स्थिति बहुत चिंताजनक है। इसी जड़ता और गति शून्यता को समाप्त करने हेतु ईस्वी सन् 1991 में कोटा, राजस्थान में स्व. श्री (डा.) राम कृष्ण आर्य लिखित शोध ग्रन्थ ‘महर्षि दयानन्द का आर्थिक चिंतन’ के विमोचन के अवसर पर एक लेखक सम्मेलन आयोजित किया गया था। जिसमें आर्य जगत् के लगभग सभी ख्यातिनाम लेखक पधारे थे। इसी सम्मेलन में सब लोगों ने मिलकर आर्य लेखक परिषद् की स्थापना की थी और जिसके उद्देष्य इस प्रकार हैं।

परिषद् के उद्देश्य

महर्षि दयानन्द सरस्वती के वैदिक चिन्तन एवं विचारधारा से अनुप्राणित तथा प्रभावशाली लेखन साहित्य सृजन एवं प्रकाशन के कार्य को हाथ में लेना हैं।

1.  धर्मवीर पं. लेखराम की वसीयत को साकार रूप देने- सृजित लेखन को एक मंच पर लाकर लेखन सम्बन्धित साहित्य सृजन तथा प्रकाशन सम्बन्धी समस्याओं का समाधान कराते हुए उन्हें हर तरह से यथायोक्ति सहायता करना।

2.  आर्य समाज और उससे सम्बन्धित समान उद्देष्य वाली सभी संस्थाओं के मूल उद्देष्य और सिद्धान्तों के आधार पर सतत् जागरूक बनाना और सद् परामर्शों का आदान-प्रदान करते हुए वैदिक साहित्य का विकास करना।

3. महर्षि दयानन्द द्वारा प्रतिप्रादित विचारों व सिद्धान्तों के प्रचार-प्रसार हेतु सभी प्रकार के प्रयास करना तथा वैदिक शिक्षा एवं संस्कार के प्रचार-प्रसार के लिए वैदिक पाठशलाओं एवं वैदिक संस्कार क्रेन्द्रों की स्थापना व संचालन करना।

4. वैदिक साहित्य को हर सम्भव सुदृढ़ बनाने हेतु लेखकों-विचारकों-अनुवादकों,कला-संस्कृति कर्मियों,शोधकर्ताओं,प्रकाशकों आदि को हर सम्भव वैचारिक अनुसंधानात्मक एवं आर्थिक सहयोग करना।

5. महिला शिक्षा को प्रोत्साहन देना तथा महिला लेखिकाओं को हर तरह प्रोत्साहित करना।

6. उद्देष्यों के अनुरूप साहित्य,पत्र-पत्रिकाओं तथा शोध-पत्रों आदि का प्रकाशन करना।

7. प्रकशित साहित्य को सशूल्क या निःशूल्क जैसे स्थिति है ,जन-जन तक पहुँचाना।

8. अप्राप्य और विलुप्तप्राय वैदिक साहित्य की खोज करना व वैदिक साहित्य के प्रतिभावान लेखकों को प्रोत्साहित करने के उद्देष्य से समय-समय पर सम्मान पुरस्कार व अभिनन्दन समारोह आयोजित कराना।

9. अप्रत्याशित संकट काल में लेखकों,विचारकों और शोधकर्ताओं को यथासम्भव आर्थिक व अन्य प्रकार के सहयोग देना।

10. ऐसे लेखन और पत्रकारिता संस्थान की स्थापना करना जिससे आर्य क्रान्तिकारी और सुधारवादी पत्रकार व लेखकों का निर्माण किया जा सके।

इस प्रकार परिषद् समग्र रूप से वे सभी कार्य करता है जो लेखन के द्वारा समाज,संस्कृति,शिक्षा,कला और साहित्य का संवर्धन में सहयोगी हो।

 आर्य लेखक परिषद् (1991 से 2007 तक)

सन् 1991 से लेकर 2007 तक परिषद् गतिशील रही और देश के अनेक स्थानों यथा.. कोटा,मुम्बई,उदयपुर,अल्मोड़ा,दिल्ली और अजेमर में इसकी बैठकें आयोजित की जाती रहीं तथा लेखक सम्मेलन भी आयोजित हुए। जिसमें भाग लेने वाले लेखकों को द्वितीय श्रेणी का मार्ग व्यय और मय भोजन भत्ते प्रदान किये गये। हमने ये कार्य दानी सहयोगियों से अनुरोध और प्रार्थना पूर्वक करवाएँ। परन्तु 2006 के पश्चात् परिषद् के मुख्य कार्यकर्ता और कोषाध्यक्ष डा. रामकृष्ण आर्य (श्री वरुण मुनि जी वानप्रस्थ) के अस्वस्थ हो जाने से परिषद् गति शून्य हो गई थी और पश्चात् उनके दिवंगत हो जाने से पूरी तरह निश्चय हो चुकी थी। अब पुनः हमारे कुछ युवा साथियों ने इसे गतिशील और सशक्त करने का मन बनाया है। 18 फरवरी 2018 से यह पुनः सक्रिय हो चुकी है।

Show Buttons
Hide Buttons